शीर्ष अदालत ने एआईएफ, एफपीआई के अंतिम लाभार्थी के खुलासे संबंधी मोइत्रा की अर्जी खारिज की
भाषा
- 29 Oct 2026, 05:37 PM
- Updated: 05:37 PM
नयी दिल्ली, 29 अक्टूबर (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) को ऐसा कोई निर्देश देने से इनकार कर दिया, जिसके तहत वैकल्पिक निवेश कोष (एआईएफ), विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) और भारत में उनके मध्यस्थों के अंतिम लाभार्थी स्वामियों तथा उनके निवेश पोर्टफोलियो का सार्वजनिक खुलासा करना अनिवार्य हो जाता।
न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना, न्यायमूर्ति आर महादेवन और न्यायमूर्ति डी के उपाध्याय की पीठ ने तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि वास्तविक लाभार्थी स्वामियों के बारे में चीजें पूर्ण रूप से सार्वजनिक करने के लिए कोई कानूनी व्यवस्था या ढांचा मौजूद नहीं है।
पीठ ने कहा, ''हमारा मानना है कि संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल कर ऐसी प्रार्थना स्वीकार नहीं की जा सकती, क्योंकि याचिकाकर्ता द्वारा यहां जिस प्रकार के पूर्ण खुलासे की अपील की गई है, उसके लिए पहले से ऐसा कानूनी ढांचे या विनियम होना जरूरी है।"
न्यायालय ने कहा, '' ऐसे किसी कानूनी ढांचे या नियमन के अभाव में, अदालत अंतिम लाभार्थी स्वामियों के बारे में सार्वजनिक खुलासा करने का निर्देश नहीं दे सकती... हमारा मानना है कि याचिकाकर्ता द्वारा किये गये अनुरोध को यह अदालत स्वीकार नहीं कर सकती। इसी के साथ यह रिट याचिका निस्तारित की जाती है।''
पीठ ने आरंभ में मोइत्रा से ऐसी याचिका दायर करने पर सवाल पूछा और कहा कि वह संसद में यह मुद्दा उठा सकती थीं एवं इस पर चर्चा की मांग कर सकती थीं।
न्यायालय ने कहा कि किसी व्यवस्था के न होने की स्थिति में वह कोई आदेश जारी नहीं कर सकता। इसी के साथ शीर्ष अदालत ने इस याचिका का निपटान कर दिया।
न्यायमूर्त नागरत्ना ने कहा, ''याचिकाकर्ता (मोइत्रा) एक सांसद हैं। हम जानना चाहते हैं कि वह अपना नाम क्यों देना चाहती हैं और यह याचिका क्यों दायर कर रही हैं। हमें इस बात की चिंता है कि क्या हमें इस याचिकाकर्ता के कहने पर इस मामले में पड़ना चाहिए या नहीं। वह संसद में आसानी से इस पर चर्चा की मांग कर सकती हैं।''
वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि मोइत्रा एक आम नागरिक की तुलना में कहीं अधिक जानकारी रखती हैं, क्योंकि वह सांसद हैं और उनका भारत तथा विदेशों में वित्तीय कंपनियों के साथ काम करने का अनुभव रहा है।
भूषण ने अपनी बात रखते हुए कहा, ''हमारे शेयर बाजार में इन एआईएफ और एफपीआई का सैकड़ों लाख करोड़ रुपये लगा हुआ है। यह शेयर बाजार की कुल होल्डिंग का 20 प्रतिशत से भी अधिक है। वह (मोइत्रा) देश के मासूम निवेशकों की रक्षा करना चाहती हैं...।''
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने भूषण से कहा,''जनहित याचिका दायर करना और अनुच्छेद 32 के तहत याचिका के जरिये इस तरह की चर्चा कराना एक अलग बात है। अनुच्छेद 32 के तहत दायर याचिका के अपने अलग परिणाम होते हैं।''
भूषण ने तर्क दिया कि आजकल संसद में किसी विषय पर चर्चा कराना बहुत मुश्किल है और वह (मोइत्रा) इस संबंध में एक हलफनामा दायर कर सकते हैं।''
पीठ ने कहा कि अदालत के सामने कोई भी वास्तव में प्रभावित निवेशक मौजूद नहीं है, ऐसे में याचिकाकर्ता के वकील (भूषण) याचिका का दायरा न बढ़ाएं, बल्कि अनुच्छेद 32 के तहत दायर इस याचिका के परिणामों और बाजार पर इसके असर पर ध्यान केंद्रित करें।
भूषण ने दलील दी कि भारत में एआईएफ और एफपीआई के जरिये आने वाले अपारदर्शी निवेश की वजह से शेयर बाजार में हेरफेर संभव हो जाता है।
शीर्ष अदालत ने कहा कि जब तक कोई स्पष्ट व्यवस्था या नियम लागू नहीं हो जाता, तब तक अदालत कोई आदेश जारी नहीं कर सकती।
केंद्र और सेबी की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि याचिकाकर्ता पर कुछ व्यापारियों के कहने पर संसद में सवाल पूछने का आरोप है।
उन्होंने भूषण की दलीलों का खंडन किया और कहा कि वह जो मांग कर रहे हैं, उससे बाजार में भारी उथल-पुथल मच जाएगी।
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