कोई समाज पढ़ना बंद कर देता है, तो वह गहन चिंतन की क्षमता खो देता है: उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन
नेत्रपाल
- 22 May 2026, 11:07 PM
- Updated: 11:07 PM
नयी दिल्ली, 22 मई (भाषा) उपराष्ट्रपति सी पी राधाकृष्णन ने शुक्रवार को युवाओं में घटती पठन-पाठन की आदत पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि जो समाज पढ़ना छोड़ देता है, वह धीरे-धीरे गहन, आलोचनात्मक और रचनात्मक रूप से सोचने की क्षमता खो देता है।
पी पी सत्यन द्वारा लिखित पुस्तक 'द लाइब्रेरी मैन ऑफ इंडिया: द स्टोरी ऑफ पी एन पणिक्कर' का विमोचन करते हुए उपराष्ट्रपति ने पणिक्कर को एक दूरदर्शी व्यक्ति बताया, जिन्होंने पुस्तकों और ज्ञान की शक्ति से लाखों लोगों के जीवन को बदल दिया।
राधाकृष्णन ने कहा कि पणिक्कर का मानना था कि जाति, वर्ग, गरीबी या भौगोलिक स्थिति से परे प्रत्येक व्यक्ति की ज्ञान तक पहुंच होनी चाहिए।
केरल के कुट्टानाड में पणिक्कर की साधारण शुरुआत को याद करते हुए राधाकृष्णन ने कहा कि उन्होंने जीवन में जल्दी ही समझ लिया था कि निरक्षरता केवल पढ़ने में असमर्थता नहीं है, बल्कि गरिमा, अवसर और मानवीय प्रगति के लिहाज से एक बाधा है।
केरल में पुस्तकालय और साक्षरता आंदोलन की शुरुआत करने में पणिक्कर द्वारा निभाई गई भूमिका का जिक्र करते हुए, उपराष्ट्रपति ने कहा कि 'सनातन धर्म पुस्तकालय' नामक एक साधारण वाचनालय के रूप में जो सफर शुरू हुआ उसने अंततः दक्षिणी राज्य के सामाजिक और बौद्धिक परिदृश्य को बदल दिया।
राधाकृष्णन ने कहा, ''उन्होंने गांवों और दूरदराज की आदिवासी बस्तियों में अथक यात्रा की और 'पढ़ो और बढ़ो' के सरल लेकिन शक्तिशाली संदेश के माध्यम से आम लोगों और स्वयंसेवकों को प्रेरित किया।''
उपराष्ट्रपति ने पणिक्कर को 'केरल के सांस्कृतिक पुनर्जागरण का जनक' बताते हुए कहा कि उनका मानना था कि ज्ञान पर कभी भी कुछ लोगों का विशेषाधिकार नहीं रहना चाहिए।
नालंदा और तक्षशिला जैसे भारत के शिक्षा केंद्रों की विरासत पर प्रकाश डालते हुए राधाकृष्णन ने कहा कि पुस्तकालय ई-पुस्तकों और ऑनलाइन संसाधनों के माध्यम से डिजिटल युग में प्रवेश कर चुके हैं, लेकिन युवाओं की पढ़ने की आदतों में धीरे-धीरे गिरावट आना गंभीर चिंता का विषय है।
उन्होंने कहा, ''एक पुस्तकालय बच्चे का भविष्य बदल सकता है। एक किताब जीवन को बदल सकती है। और एक दृढ़ निश्चयी व्यक्ति पूरे समाज को बदल सकता है।''
भाषा संतोष नेत्रपाल
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