स्वतंत्रता की रक्षा करनी होगी, असमानता का सामना करना होगा: प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत
दिलीप
- 14 Jul 2026, 09:54 PM
- Updated: 09:54 PM
नयी दिल्ली, 14 जुलाई (भाषा) प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने असमानता का सामना करने और स्वतंत्रता की रक्षा करने की जरूरत पर जोर देते हुए मंगलवार को कहा कि औपचारिक समानता के बावजूद असमानता बनी हुई है और अधीरता के इस दौर में संस्थाएं जनता का भरोसा बनाए रखने की कोशिश कर रही हैं।
पूर्व सीजेआई बी.आर. गवई की लिखी किताब ''द वॉयस ऑफ जस्टिस: जस्टिस गवई स्पीक्स'' के विमोचन कार्यक्रम में, न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि जहां मौलिक अधिकार नागरिकों को सरकार की मनमानी से सुरक्षा प्रदान करते हैं, वहीं (संविधान के) नीति-निदेशक तत्व गणतंत्र को अधिक न्यायपूर्ण सामाजिक व्यवस्था की ओर ले जाते हैं।
उन्होंने कहा, ''व्यक्तिगत आजादी और समाज में हो रहे परिवर्तन के बीच यह संतुलन उनके संवैधानिक विचारों के मुख्य विषयों में से एक है।''
प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ''यहीं पर यह किताब मौजूदा हालात पर सबसे स्पष्ट बात करती है। आजकल संवैधानिक अदालतों (उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों) के समक्ष जो सवाल हैं, वे आसान नहीं हैं।''
उन्होंने कहा, ''आज, प्रौद्योगिकी अक्सर सिद्धांतों से तेजी से आगे बढ़ती है। औपचारिक समानता के बावजूद असमानताएं बनी हुई हैं। और संस्थान जल्दबाजी के इस दौर में जनता का भरोसा बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं।''
इस किताब का विमोचन उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने किया। इसमें पूर्व सीजेआई गवई के सार्वजनिक जीवन के दौरान दिए गए भाषणों को शामिल किया गया है।
कार्यक्रम में उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति विक्रम नाथ सहित अन्य न्यायाधीश, दिल्ली उच्च न्यायालय के कई न्यायाधीश, अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और अन्य लोग शामिल हुए।
अपने संबोधन में सीजेआई ने कहा, ''आज़ादी की रक्षा तो करनी ही है, लेकिन असमानता का भी सामना करना होगा।''
न्यायमूर्ति नाथ ने कहा कि न्यायिक फैसले स्वाभाविक रूप से कानून की अनुशासित भाषा में लिखे जाते हैं, लेकिन न्यायाधीशों के भाषण अक्सर उनके व्यक्तित्व, उनके मूल्यों, जिन संस्थाओं में वे विश्वास रखते हैं और जिस समाज के निर्माण में वे योगदान देना चाहते हैं, उस बारे में कहीं अधिक बताते हैं।
न्यायमूर्ति गवई ने कहा कि भले ही उनके द्वारा दिये गए हर भाषण का संदर्भ अलग-अलग रहा हो, लेकिन वे सभी एक ही सोच से जुड़े थे कि संविधान का असल मकसद आम नागरिकों के जीवन को बेहतर बनाना है।
भाषा सुभाष दिलीप
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