न्यायालय ने डेटा संरक्षण कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर केंद्र से जवाब मांगा
पवनेश
- 07 Aug 2026, 07:15 PM
- Updated: 07:15 PM
नयी दिल्ली, सात अगस्त (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम के माध्यम से सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम में किए गए संशोधनों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा।
प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने वरिष्ठ अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर और अधिवक्ता प्रशांत भूषण की दलीलें सुनने के बाद केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से सरकार का जवाब दाखिल करने को कहा।
याचिकाओं में कहा गया है कि इन संशोधनों से पारदर्शिता कमजोर होती है, क्योंकि व्यक्तिगत जानकारी के प्रकटीकरण से जुड़े जनहित संरक्षण प्रावधान को हटा दिया गया है।
इन याचिकाओं में आरटीआई अधिनियम की धारा 8(1)(जे) में किए गए संशोधन को चुनौती दी गई है। यह धारा व्यक्तिगत जानकारी के प्रकटीकरण से संबंधित अपवादों का प्रावधान करती है।
कानून के इस प्रावधान में 2023 में डीपीडीपी अधिनियम की धारा 44(3) के माध्यम से संशोधन किया गया, ताकि सरकारी सूचनाओं के अनुरोधों में व्यक्तिगत डेटा और निजता से जुड़े अपवादों से निपटने के तरीके में बदलाव किया जा सके।
कानून के समर्थन में कहा गया है कि यह बदलाव वैध पारदर्शिता को नहीं रोकता, बल्कि आरटीआई (आरटीआई) व्यवस्था को निजता के मौलिक अधिकार के साथ संतुलित करता है।
याचिकाकर्ताओं में से एक की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर ने कहा कि यह संशोधन पहले के प्रावधान में बदलाव करता है, क्योंकि इसमें उन सुरक्षा उपायों को हटा दिया गया है जो निजता संबंधी चिंताओं और जनता के जानने के अधिकार के बीच संतुलन बनाए रखते थे।
उन्होंने कहा, ''असल चुनौती आरटीआई की धारा 8(1)(जे) में किए गए संशोधन को लेकर है। पहले इस प्रावधान में यह तय करने के लिए अंतर्निहित सुरक्षा उपाय मौजूद थे कि किस प्रकार की व्यक्तिगत जानकारी को सार्वजनिक करने से रोका जा सकता है। अब उन सुरक्षा उपायों को हटा दिया गया है।''
प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि उन्होंने पहले भी कहा था कि किस प्रकार के डिजिटल व्यक्तिगत डेटा को सुरक्षा की आवश्यकता है, इस संबंध में कुछ संतुलन बनाना होगा।
सॉलिसिटर जनरल ने पीठ को बताया कि केंद्र सरकार अगले दो-तीन सप्ताह के भीतर अपना जवाब दाखिल कर देगी।
एक हस्तक्षेपकर्ता की ओर से अदालत में पेश अधिवक्ता निशा अंबानी ने दलील दी कि इन संशोधनों का खोजी पत्रकारिता पर गंभीर असर पड़ेगा।
प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ''निजता के अधिकार के साथ संतुलन स्थापित करना होगा।''
याचिकाकर्ताओं में से एक की ओर से पेश भूषण ने कहा कि सूचना के अधिकार और निजता के अधिकार के बीच संतुलन को शीर्ष अदालत पहले ही एक फैसले में तय कर चुकी है।
भूषण ने कहा, ''वह संतुलन अब समाप्त कर दिया गया है। संशोधन में सभी व्यक्तिगत सूचनाओं को सार्वजनिक किए जाने से छूट प्राप्त मान लिया गया है।''
पीठ ने कहा कि आगे की कार्यवाही करने से पहले वह केंद्र सरकार के जवाब पर विचार करेगी।
इससे पहले पीठ ने 16 फरवरी को याचिकाकर्ताओं को नोटिस जारी किये थे।
भाषा
देवेंद्र पवनेश
पवनेश
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