रूपाला के खिलाफ राजपूतों के आंदोलन से पाटीदारों के साथ पुराना टकराव तेज नहीं होगा : विशेषज्ञ
खारी मनीषा
- 02 Apr 2024, 11:23 AM
- Updated: 11:23 AM
(प्रशांत ठाकोर)
राजकोट, दो अप्रैल (भाषा) राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि केंद्रीय मंत्री एवं राजकोट लोकसभा सीट से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के उम्मीदवार परषोत्तम रूपाला (पाटीदार) के खिलाफ राजपूत समुदाय का आंदोलन पूर्व की तरह दोनों समुदायों के बीच टकराव पैदा नहीं करेगा।
राजकोट में 22 मार्च को एक छोटी सभा को संबोधित करते हुए रूपाला ने कहा था कि तत्कालीन ‘महाराजाओं’ ने विदेशी शासकों के साथ-साथ अंग्रेजों के अत्याचार के आगे घुटने टेक दिए थे। केंद्रीय मंत्री ने यह भी कहा था कि इन ‘महाराजाओं’ ने शासकों के साथ रोटी-बेटी का संबंध रखा।
राजपूत समुदाय के सदस्यों ने इस टिप्पणी को अपना अपमान बताया। उन्होंने भाजपा से रूपाला की उम्मीदवारी वापस लेने आग्रह किया या हार के लिए तैयार रहने को कहा।
समुदाय के सदस्य गुजरात के कई हिस्सों में विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। गुजरात में सभी 26 लोकसभा सीट पर एक साथ सात मई को मतदान होना है।
भाजपा ने इस बार राजकोट से निवर्तमान सांसद मोहन कुंडरिया का टिकट काटकर रूपाला को प्रत्याशी बनाया है। कुंडरिया भी पाटीदार समुदाय से ताल्लुक रखते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, राजपूत समुदाय के नेताओं ने स्पष्ट कर दिया है कि वे रूपाला के खिलाफ हैं और भाजपा द्वारा उनकी जगह किसी अन्य पाटीदार उम्मीदवार को खड़ा करने से उन्हें कोई दिक्कत नहीं है।
राजनीतिक विश्लेषक रवींद्र त्रिवेदी ने कहा, ‘‘ अतीत में, दोनों समुदाय एक-दूसरे के खिलाफ थे। लेकिन इस मामले में कोई भी पाटीदार समूह रूपाला के समर्थन में आगे नहीं आया है। राजपूत नेता पाटीदारों के खिलाफ नहीं हैं। वे रूपाला का विरोध कर रहे हैं। मुझे यहां दोनों समूहों के बीच कोई टकराव नजर नहीं आता।’’
उन्होंने बताया कि इस मुद्दे पर भाजपा को 10 से 20 हजार मतों का नुकसान हो सकता है, लेकिन इससे उनकी जीत की संभावना कम नहीं होगी।
त्रिवेदी ने कहा, ‘‘ राजकोट लोकसभा सीट में लगभग 50 हजार राजपूत मतदाता हैं, जो मुख्य रूप से एक शहरी निर्वाचन क्षेत्र है। इसके अलावा, कांग्रेस को मजबूत उम्मीदवार भी नहीं मिला है। ऐसे में उम्मीद कम है कि राजपूतों के रुख से चुनाव के अंतिम परिणाम पर कोई खास असर पड़ेगा।’’
साल 1980 के दशक में क्षत्रिय समुदाय से आने वाले राजपूत और पाटीदार के बीच विवाद के कारण हत्याएं तक हुई थीं।
वर्ष 1982 में भावनगर के मनगढ़ गांव के पास तीन राजपूतों की हत्या ने इस टकराव को और बढ़ा दिया था। मामले में गिरफ्तार किए गए लगभग 20 पटेल (पाटीदारों) को बाद में बरी कर दिया गया। राजपूतों ने दो साल बाद कथित तौर पर बदला लेने के लिए मनगढ़ के नौ पाटीदारों की हत्या कर दी थी।
राजनीतिक विश्लेषक जगदीश आचार्य ने कहा कि इन दोनों समुदाय के बीच पुरानी दुश्मनी भाजपा के कार्यकाल में लगभग खत्म हो गई क्योंकि एकजुट होकर हिंदू वोट बैंक मजबूत हो गया।
रूपाला की टिप्पणी पर उन्होंने कहा, ‘‘ यह पाटीदार बनाम क्षत्रिय का मामला नहीं है। यह रूपाला और कुछ क्षत्रिय नेताओं के बीच का मामला है। भाषण देते हुए वक्त रूपाला की जुबान फिसल गई थी। रूपाला पूर्व में राजपूतों की प्रशंसा कर चुके हैं।’’
भाषा खारी