इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने लखनऊ में एक विवादित संपत्ति को लेकर वकीलों की 'गुंडागर्दी' पर चिंता जताई
धीरज
- 23 Jul 2026, 01:17 AM
- Updated: 01:17 AM
लखनऊ, 22 जुलाई (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने बुधवार को राजधानी लखनऊ के ऐशबाग इलाके में एक विवादित संपत्ति को लेकर वकीलों के एक समूह द्वारा की गई कथित गुंडागर्दी पर गंभीर चिंता जताई।
अदालत ने पुलिस से सवाल किया कि उसके कर्मी लगभग चार घंटे तक मौके पर मौजूद रहने के बावजूद चुप क्यों रहे?
न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला की पीठ ने लखनऊ के संयुक्त पुलिस आयुक्त (कानून एवं व्यवस्था), पुलिस उपायुक्त (मध्य) और कैसरबाग के सहायक पुलिस आयुक्त को बृहस्पतिवार 23 जुलाई को अदालत में पेश होने का आदेश दिया।
अदालत ने लखनऊ के पुलिस आयुक्त को भी वीडियो कांफ्रेंस के जरिए कार्यवाही में शामिल होने का निर्देश दिया। पीठ ने साथ ही, उन्हें यह पता लगाने के लिए कहा कि पुलिसकर्मियों की मौजूदगी के बावजूद प्रभावी कार्रवाई क्यों नहीं की गई।
पीठ ने अधिवक्ता सक्षम सिंह द्वारा दायर जनहित याचिका पर यह आदेश दिया। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया और उत्तर प्रदेश बार काउंसिल को इस मामले में पक्षकार बनाया जाए।
याचिका के मुताबिक सात जुलाई को सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ था जिसमें वकील की पोशाक पहने दर्जनों लोग ऐशबाग में दयानंद सेवा संस्थान के परिसर में जबरन घुसते हुए दिखे और आरोप है कि उन्होंने कर्मचारियों के साथ मारपीट की, बदसलूकी की, ईंटें फेंकी और सीसीटीवी कैमरों में तोड़फोड़ की।
याचिका में कहा गया है कि मनोरमा मिश्रा द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत में अमित मिश्रा, राहुल शुक्ला, दीपक प्रकाश, अरुण जायसवाल और आनंद मोहन तिवारी समेत कई वकील नामजद हैं।
पीठ ने सहायक पुलिस आयुक्त द्वारा प्रस्तुत की गई वीडियो फुटेज देखने के बाद यह पाया की घटना के दौरान मौके पर काम से कम 15 पुलिसकर्मी मौजूद थे लेकिन इसके बावजूद वकीलों की पोशाक पहने लोगों का एक बड़ा समूह परिसर के अंदर बिना अनुमति के बेरोकटोक घुसा और वहां मौजूद लोगों को डराया-धमकाया।
अदालत ने सवाल किया कि जब हालात ऐसे थे तो अतिरिक्त पुलिस बल क्यों नहीं बुलाया गया और अगर वकीलों के वेश में आए लोग पूर्वाहन 10 बजे से दोपहर दो बजे तक परिसर के अंदर रहे तो किसी को गिरफ्तार क्यों नहीं किया गया।
सहायक पुलिस आयुक्त ने अदालत को बताया कि वह अपराह्न दो बजे के बाद ही मौके पर पहुंचे लेकिन तब तक सब कुछ सामान्य हो चुका था।
पीठ ने इस पर तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि वीडियो में दिख रहे पुलिसकर्मी 'गुंडागर्दी' करने वाले कथित वकीलों के प्रति काफी मित्रवत और स्पष्ट रूप से निष्क्रिय नजर आ रहे थे।
पीठ ने कहा कि ऐसे में इस बात की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता कि पुलिसकर्मियों ने इन गैर-कानूनी कामों में मदद की हो।
अदालत के बार सदस्यों की इन बातों पर भी गौर किया कि वकीलों के कुछ गुट विवादित सम्पत्तियों पर नजर रखते हैं और कानून की सही प्रक्रिया अपनाने के बजाय गैर-कानूनी तरीकों से ऐसे विवादों को सुलझाने का वादा करते हैं।
पीठ ने इस पर कहा कि अगर यह सच है तो ऐसा व्यवहार न सिर्फ वकालत के पेशे को बदनाम करता है बल्कि कानून के राज को भी कमजोर करता है।
पीठ ने इस बात पर भी गौर किया कि इस घटना के समय वकील सौरभ कुमार वर्मा भी मौके पर मौजूद थे जिनका नाम 21 जुलाई को लखनऊ जिला अदालत के अंदर दिल्ली से आए कुछ वकीलों और उनके मुवक्किल पर कथित हमले से जुड़े एक और मामले में सामने आया है।
पीठ ने इस स्थिति को चिंताजनक बताते हुए लखनऊ के पुलिस आयुक्त को याचिकाकर्ता अधिवक्ता सक्षम सिंह की सुरक्षा सुनिश्चित करने का आदेश दिया और साथ ही कहा कि वीडियो फुटेज वाली पेन ड्राइव को सीलबंद लिफाफे में सुरक्षित रखा जाए और उसकी एक डिजिटल प्रति रजिस्ट्री में जमस कराई जाए। अदालत ने कहा कि इस जनहित याचिका को 21 जुलाई को जिला अदालत परिसर में हुई हिंसा से जुड़ी लंबित याचिकाओं के साथ जोड़ दिया गया है और इस पर 23 जुलाई को सुनवाई होगी।
भाषा सं सलीम धीरज
धीरज
2307 0117 लखनऊ