सोनम वांगचुक: नवोन्मेष, असहमति और भारत की 'सामूहिक चेतना' बनने की कहानी
संतोष
- 19 Jul 2026, 12:50 AM
- Updated: 12:50 AM
(तस्वीरों के साथ)
नयी दिल्ली, 18 जुलाई (भाषा) सोनम वांगचुक (59) को बीते वर्षों में कई पहचान मिलीं-इंजीनियर, नवोन्मेषक, शिक्षा सुधारक, पर्यावरण कार्यकर्ता और रेमन मैगसायसाय पुरस्कार विजेता। उन्हें 2025 तक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का समर्थक कहा जाता था, फिर कुछ ही समय बाद उन्हें ''राष्ट्रविरोधी'' कहा गया और अब उन्हें नायक तथा देश की ''सामूहिक चेतना'' कहा जा रहा है।
इनमें से कुछ पहचानों को वांगचुक ने स्वीकार किया और कुछ का विरोध किया लेकिन ये सभी उस व्यक्ति की यात्रा को दर्शाती हैं जो इस समय देश के सबसे चर्चित आंदोलनकारियों में शामिल हैं। वांगचुक ने दुनिया के सबसे कठिन भौगोलिक क्षेत्रों में से एक लद्दाख में करीब चार दशक तक समस्याओं के समाधान तलाशे, कक्षाओं को नया रूप दिया, पर्यावरण अनुकूल प्रौद्योगिकियां विकसित कीं और नाजुक हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र तथा लद्दाख के लिए संवैधानिक सुरक्षा उपायों की आवाज बुलंद की।
लद्दाख के अलची के पास उलेतोकपो गांव में 1966 में जन्मे वांगचुक जम्मू-कश्मीर के पूर्व मंत्री सोनम वांग्याल के पुत्र हैं। सुदूर हिमालयी क्षेत्र में पले-बढ़े वांगचुक अक्सर अपने शुरुआती स्कूली दिनों की कठिनाइयों का उल्लेख करते रहे हैं। जब भाषा उनके सीखने की राह में बाधा बन गई तो इसी अनुभव ने उनके इस विश्वास को आकार दिया कि शिक्षा स्थानीय परिस्थितियों और जरूरतों से जुड़ी होनी चाहिए, न कि सभी पर एक जैसी व्यवस्था थोपी जानी चाहिए।
वर्ष 1987 में श्रीनगर के क्षेत्रीय इंजीनियरिंग कॉलेज (जो अब राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईटी), श्रीनगर है) से 'मेकैनिकल इंजीनियरिंग' की पढ़ाई पूरी करने के बाद वांगचुक ने परंपरागत इंजीनियरिंग करियर नहीं चुना।
विद्यार्थी जीवन में ही उन्होंने मुख्यधारा के विद्यालयों में कठिनाइयों का सामना कर रहे लद्दाखी विद्यार्थियों की मदद करनी शुरू कर दी थी। उन्होंने 1988 में अपने भाई और कुछ मित्रों के साथ 'स्टूडेंट्स एजुकेशनल एंड कल्चरल मूवमेंट ऑफ लद्दाख' (सेकमोल) की स्थापना की। इसका उद्देश्य क्षेत्र की शिक्षा व्यवस्था में सुधार करना था।
सेकमोल ने सरकारी विद्यालयों में पढ़ाई के नतीजे बेहतर करने के उद्देश्य से 1994 में 'ऑपरेशन न्यू होप' की शुरुआत की। चार वर्ष बाद वांगचुक ने लेह के पास सेकमोल वैकल्पिक विद्यालय की स्थापना की। व्यावहारिक शिक्षा, सौर ऊर्जा से संचालित परिसर और आत्मनिर्भरता पर जोर देने वाले इसके मॉडल ने दुनियाभर के शिक्षाविदों का ध्यान आकर्षित किया।
वांगचुक ने बाद में 'आइस स्तूप' प्रौद्योगिकी विकसित की, जिसमें सर्दियों के पानी को शंकु के आकार की बर्फीली संरचनाओं में जमा किया जाता है और बुवाई के मौसम में उसका इस्तेमाल किया जाता है।
उन्होंने अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों के अनुकूल सौर ऊर्जा आधारित इमारतों और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने वाली अन्य प्रौद्योगिकियों को भी बढ़ावा दिया।
उनके काम को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली। उन्हें 2008 में सीएनएन-आईबीएन 'रियल हीरोज अवॉर्ड', 2016 में 'रोलेक्स अवॉर्ड फॉर एंटरप्राइज' और 'इंटरनेशनल टेरा अवॉर्ड', 2017 में 'ग्लोबल अवॉर्ड फॉर सस्टेनेबल आर्किटेक्चर' तथा 2018 में रेमन मैगसायसाय पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
अनुभव के जरिये सीखने के अपने विचार को आगे बढ़ाने के लिए वांगचुक ने 2016 में 'हिमालयन इंस्टीट्यूट ऑफ अल्टरनेटिव्स', लद्दाख (एचआईएएल) की सह-स्थापना की।
वांगचुक ने 2019 में तत्कालीन जम्मू-कश्मीर राज्य से लद्दाख को अलग कर केंद्रशासित प्रदेश बनाने के केंद्र सरकार के फैसले का शुरुआत में स्वागत किया था। उस समय नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के साथ उनके संबंध सहज दिखाई देते थे।
हालांकि, बाद में वांगचुक लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची के दायरे में लाने की मांग करने वाले प्रमुख चेहरों में शामिल हो गए। उनका कहना है कि क्षेत्र की भूमि, रोजगार, जनजातीय पहचान और नाजुक पारिस्थितिकी की रक्षा के लिए संवैधानिक प्रावधान जरूरी हैं।
उन्होंने 2023 में लद्दाख के लिए संवैधानिक संरक्षण और अधिक लोकतांत्रिक अधिकारों की मांग को लेकर कई प्रदर्शनों, पदयात्राओं और भूख हड़तालों का नेतृत्व किया या उनमें भाग लिया।
उनका आंदोलन सितंबर 2025 में उस समय निर्णायक मोड़ पर पहुंचा, जब लद्दाख आंदोलन के दौरान उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत हिरासत में लेकर जोधपुर केंद्रीय कारागार भेज दिया गया। करीब छह महीने की हिरासत के बाद केंद्र सरकार ने आदेश वापस ले लिया और मार्च 2026 में वांगचुक को रिहा कर दिया गया।
उनकी हालिया भूख हड़ताल ने हालांकि लद्दाख से ध्यान हटाकर देश की शिक्षा व्यवस्था पर केंद्रित कर दिया है।
राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट) में कथित अनियमितताओं को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी के नेतृत्व में जारी आंदोलन में शामिल होकर वांगचुक ने 28 जून को प्रदर्शनकारियों के समर्थन में अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की।
आंदोलन में उनकी भूमिका के लिए कुछ लोगों ने उन्हें ''नायक'' बताया, लेकिन वांगचुक ने लोगों से स्वयं अपना नायक बनने की अपील की। शिक्षाविदों, फिल्मकारों और नागरिक समाज के कार्यकर्ताओं ने शुक्रवार को वांगचुक से अनशन समाप्त करने की अपील करते हुए उन्हें ''हमारी सामूहिक चेतना'' बताया।
भूख हड़ताल के 20 दिन बाद चिकित्सकों ने बताया कि उनका वजन करीब 9.5 किलोग्राम कम हो गया है। बिगड़ते स्वास्थ्य को लेकर चिंता के बीच दिल्ली पुलिस उन्हें शनिवार को जबरन सफदरजंग अस्पताल ले गई।
वांगचुक का नाम अक्सर 2009 की फिल्म '3 इडियट्स' के किरदार फुनसुख वांगडू से जोड़ा जाता रहा है और इस सप्ताह यह चर्चा फिर से शुरू हुई, जब अभिनेता आमिर खान ने कहा कि फिल्म बनाते समय वह और निर्देशक राजकुमार हिरानी वांगचुक को नहीं जानते थे।
इसके बाद सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं ने 2008 का एक वीडियो फिर साझा किया, जिसमें वांगचुक आमिर खान की मौजूदगी वाले एक कार्यक्रम में सीएनएन-आईबीएन 'रियल हीरोज अवॉर्ड' ग्रहण करते दिखाई दे रहे हैं। एक अन्य वीडियो भी प्रसारित हुआ, जिसमें वांगचुक उस मुलाकात को याद करते नजर आते हैं।
राजनीतिक नेताओं, छात्र संगठनों और फिल्म जगत की हस्तियों से समर्थन मिलने के बाद वांगचुक एक बार फिर राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में हैं।
शिक्षा सुधार से लेकर पर्यावरण संरक्षण और अब नीट परीक्षा में कथित अनियमितताओं के खिलाफ आंदोलन तक, वांगचुक की सार्वजनिक यात्रा लगातार नए मोड़ लेती रही है। राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में वांगचुक की यह नयी भूमिका उनके उस सार्वजनिक जीवन की अगली कड़ी है, जिसमें नवोन्मेष, जनसरोकार और सत्ता से असहमति तीनों ने उनकी पहचान गढ़ी है।
भाषा सिम्मी संतोष
संतोष
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