उपासना स्थल अधिनियम सार्वजनिक उद्देश्य के लिए संपत्ति अधिग्रहण नहीं रोकता: अदालत
अमित
- 03 Jul 2026, 10:24 PM
- Updated: 10:24 PM
प्रयागराज, तीन जुलाई (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा है कि उपासना स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 केवल एक उपासना स्थल के धार्मिक चरित्र के परिवर्तन को रोकता है, लेकिन यह राज्य को धर्मनिरपेक्ष या सार्वजनिक उद्देश्य के लिए ऐसी संपत्तियों का अधिग्रहण करने से नहीं रोकता।
इस टिप्पणी के साथ अदालत ने वाराणसी में दालमंडी इलाके के चौड़ीकरण और सौंदर्यीकरण पर रोक लगाने के अनुरोध वाली रिट याचिका खारिज कर दी। यह परियोजना श्री काशी विश्वनाथ धाम गलियारा विकास का हिस्सा है।
दालमंडी इलाके में रह रहे छह किरायेदारों और दुकानदारों ने उस इलाके से बेदखल किए जाने से रोकने का अनुरोध किया था और साथ ही छह मस्जिदों के प्रस्तावित अधिग्रहण और ध्वस्तीकरण पर भी रोक लगाने का अनुरोध किया था।
सैयद राशिद अली और छह अन्य लोगों द्वारा दायर याचिका खारिज करते हुए न्यायमूर्ति जे जे मुनीर और न्यायमूर्ति अरुण कुमार की खंडपीठ ने कहा, "1991 का अधिनियम उपासना स्थल का परिवर्तन रोकता है। यह राज्य सरकार को एक धर्मनिरपेक्ष और सार्वजनिक उद्देश्य जैसे सड़क का विकास आदि के लिए किसी धार्मिक स्थल का अधिग्रहण करने से नहीं रोकता।"
दालमंडी क्षेत्र काशी विश्वनाथ मंदिर से करीब 800 मीटर की दूरी पर स्थित है और जिला प्रशासन द्वारा जिन छह प्राचीन मस्जिदों को ध्वस्त किए जाने का प्रस्ताव है, उनमें अंजुमन इंतेजामिया मस्जिद, मस्जिद रंगीले शाह, मस्जिद अली रजा खान, मस्जिद करीमुल्लाह बेग, मस्जिद निसारन और मस्जिद संगमरमर शामिल हैं।
याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि हजारों नागरिकों को उनकी आजीविका और आश्रय के अधिकार से वंचित कर और छह प्राचीन मस्जिदों को ध्वस्त कर उनके उपासना के अधिकार से वंचित करके कोई सार्वजनिक उद्देश्य पूरा नहीं होगा। उन्होंने दलील दी कि ये मस्जिदें उपासना स्थल अधिनियम के तहत संरक्षित हैं और इन्हें ध्वस्त करने से 1991 के अधिनियम का उल्लंघन होगा।
याचिकाकर्ताओं ने यह दलील भी दी कि परियोजना मार्ग के विस्तार के लिए प्रस्तावित अधिग्रहण मनमाना, अवैध और उनके मौलिक अधिकारों का हनन है और इसे एक विशेष समुदाय को निशाना बनाने के लिए डिजाइन किया गया है।
वहीं, राज्य सरकार के वकील ने दलील दी कि 1991 का अधिनियम सरकार को व्यापक जनहित के लिए उपासना की भूमि का अधिग्रहण करने से नहीं रोकता। उन्होंने दलील दी कि सरकार के पास सड़क, राजमार्गों या सार्वजनिक आधारभूत ढांचा के निर्माण जैसे सार्वजनिक उद्देश्य के लिए धार्मिक संपत्ति सहित किसी भी संपत्ति का अधिग्रहण करने का संप्रभु अधिकार है।
अदालत ने बृहस्पतिवार को अपने 32 पृष्ठों के निर्णय में कहा कि याचिकाकर्ता महज किराएदार हैं ना कि संपत्तियों के स्वामी और उन्हें अधिग्रहण प्रक्रिया को चुनौती देने का सीमित अधिकार है।
अदालत ने कहा, "हम मानते हैं कि याचिकाकर्ता संपत्ति के अधिकारों की रक्षा करने से कहीं अधिक अपने व्यवसाय या आजीविका के स्रोत की रक्षा करने के लिए यहां आए हैं।"
मुस्लिम होने के नाते मस्जिदों की रक्षा करने के अधिकार पर अदालत ने कहा, "यह माना जाता है कि ये मस्जिदें वक्फ पंजीकृत हैं और हर मस्जिद के अपने मुतवल्ली हैं। इस बात में कोई संदेह नहीं कि मुस्लिम समुदाय के सदस्य कुछ मामलों में आगे आ सकते हैं, लेकिन वास्तव में मुतवल्ली और वक्फ बोर्ड को ऐसी संपत्तियों की सुरक्षा करनी होती है।"
अदालत ने डाक्टर एम. इस्माइल फारुकी और अन्य बनाम केंद्र सरकार के मामले में उच्चतम न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय को आधार बनाया जिसमें यह कहा गया था कि एक मस्जिद इस्लाम धर्म के पालन का आवश्यक हिस्सा नहीं है और मुस्लिमों द्वारा कहीं भी नमाज अदा की जा सकती है, इसलिए भारत के संविधान में प्रावधानों द्वारा इसका अधिग्रहण प्रतिबंधित नहीं है।
भाषा सं राजेंद्र अमित
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