विहिप ने राम मंदिर चढ़ावा चोरी के आरोपियों की पैरवी से वकीलों को रोकने के प्रस्ताव की आलोचना की
माधव
- 30 Jun 2026, 06:14 PM
- Updated: 06:14 PM
नयी दिल्ली, 30 जून (भाषा) विश्व हिंदू परिषद (विहिप) ने मंगलवार को फैजाबाद बार एसोसिएशन के उस प्रस्ताव की आलोचना की, जिसमें वकीलों को राम जन्मभूमि मंदिर में दान की कथित चोरी के आरोपियों की तरफ से पैरवी करने से रोका गया है था।
विहिप ने कहा कि यह कदम संवैधानिक सिद्धांतों और पेशेवर नैतिकता का उल्लंघन है।
यह बयान बार एसोसिएशन द्वारा प्रस्ताव पारित करने के एक दिन बाद आया है। प्रस्ताव में कहा गया था कि कोई भी वकील राम जन्मभूमि मंदिर से दान की रकम की कथित चोरी के आरोपियों की तरफ से पेश नहीं होगा और जो वकील उनका पक्ष रखेगा, उस पर पांच लाख रुपये का जुर्माना लगाया जाएगा।
विहिप के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक कुमार ने कहा कि उन्हें इस मामले के आरोपियों के प्रति कोई सहानुभूति नहीं है, लेकिन वे किसी ऐसे रुख का समर्थन नहीं कर सकते जो ''अनैतिक और गैर-कानूनी'' हो।
उन्होंने कहा, ''राम जन्मभूमि मंदिर में चढ़ावे की चोरी जैसे गंभीर अपराध के आरोपी किसी भी व्यक्ति के प्रति मेरी कोई सहानुभूति नहीं है। हम पुरजोर मांग करेंगे कि जांच जल्द पूरी हो, मामले की सुनवाई फास्ट-ट्रैक अदालत में हो और दोषी व्यक्ति जेल जाएं, यानी अभी से चार-पांच महीने के भीतर।''
कुमार ने 'एक्स' पर एक पोस्ट में कहा, ''हालांकि, यह मुझे ऐसे रुख का समर्थन करने के लिए प्रेरित नहीं करता जो अनैतिक और गैर-कानूनी दोनों है।''
उन्होंने बार एसोसिएशन से अपने फैसले पर पुनर्विचार करने का आग्रह करते हुए कहा, ''अयोध्या बार का प्रस्ताव संवैधानिक सिद्धांतों और पेशेवर नैतिकता का उल्लंघन करता है। मुझे उम्मीद है कि अयोध्या बार एसोसिएशन इस फैसले पर विचार करेगा।''
उच्चतम न्यायालय के 2011 के ए.एस. मोहम्मद रफी मामले के फैसले का हवाला देते हुए कुमार ने कहा कि शीर्ष अदालत ने माना है कि बार एसोसिएशनों द्वारा किसी खास आरोपी का बचाव करने से इनकार करने वाले प्रस्ताव ''पूरी तरह से गैर-कानूनी'', बार की परंपराओं के विपरीत और पेशेवर नैतिकता के खिलाफ हैं।
कुमार ने कहा, ''उच्चतम न्यायालय ने कहा कि 'हमारी राय में, ऐसे प्रस्ताव पूरी तरह से गैर-कानूनी हैं, बार की सभी परंपराओं के खिलाफ हैं और पेशेवर नैतिकता के खिलाफ हैं। चाहे कोई व्यक्ति समाज की नजर में कितना भी बुरा, भ्रष्ट, नीच, पतित, विकृत, घिनौना, निंदनीय, दुष्ट या घृणित क्यों न माना जाता हो, उसे अदालत में अपना बचाव करने का अधिकार है और इसी के अनुसार वकील का यह फ़र्ज़ है कि वह उसका बचाव करे।''
कुमार ने यह भी कहा कि संविधान हर गिरफ़्तार व्यक्ति को अपनी पसंद के वकील से सलाह लेने और अपना बचाव करवाने का अधिकार देता है।
उन्होंने बार काउंसिल ऑफ इंडिया के नियमों का भी ज़िक्र किया।
उन्होंने कहा कि शीर्ष अदालत ने बार एसोसिएशनों के ऐसे प्रस्तावों को 'अमान्य' घोषित किया है और निर्देश दिया है कि उसके फैसले की प्रतियां सभी उच्च न्यायालय बार संघों और सभी राज्य बार काउंसिल को भेजी जाएं ताकि उन्हें देश भर के ज़िला बार एसोसिएशनों तक पहुंचाया जा सके।
उच्चतम न्यायालय के आदेश का हवाला देते हुए कुमार ने कहा, ''शीर्ष अदालत ने घोषित किया कि भारत में बार एसोसिएशनों के ऐसे सभी प्रस्ताव अमान्य हैं और अगर समान उचित विचार वाले वकील चाहते हैं कि देश में लोकतंत्र और कानून का शासन बना रहे, तो उन्हें ऐसे प्रस्तावों को नज़रअंदाज़ करना चाहिए और उनका विरोध करना चाहिए। नतीजे चाहे जो भी हों, बचाव करना वकील का फर्ज है और जो वकील ऐसा करने से इनकार करता है, वह गीता के संदेश का पालन नहीं कर रहा है।''
भाषा वैभव माधव
माधव
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