झारखंड उच्च न्यायालय ने हिरासत में मौतों को लेकर राज्य सरकार को फटकार लगाई
प्रशांत
- 14 May 2026, 10:54 PM
- Updated: 10:54 PM
रांची, 14 मार्च (भाषा) झारखंड उच्च न्यायालय ने राज्य में हिरासत में हुई मौतों पर चिंता व्यक्त करते हुए बृहस्पतिवार को कहा कि सरकार ने इन घटनाओं की जांच से संबंधित अनिवार्य कानूनी प्रावधानों का व्यवस्थित रूप से उल्लंघन किया है और वह ''प्रणालीगत गैर-अनुपालन की इस बेहद दुखद तस्वीर'' को देखकर ''स्तब्ध'' है।
अदालत ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए इस तथ्य पर संज्ञान लिया कि 2018 और 2025 के बीच झारखंड में हिरासत में हुई 427 मौतों में से, कार्यकारी मजिस्ट्रेटों ने 262 मामलों की जांच की, जबकि दंड प्रक्रिया संहिता और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अनुसार यह जांच न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा की जानी चाहिए।
न्यायमूर्ति एम.एस. सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की पीठ ने कहा, ''राज्य द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों का अवलोकन करने पर, और यह मानते हुए कि यह पूरी और सही स्थिति को दर्शाता है, यह न्यायालय अत्यंत स्तब्ध है।''
अदालत ने टिप्पणी की, ''यद्यपि प्रतिवादियों का दावा है कि सभी 427 मामलों में मजिस्ट्रेट द्वारा जांच की गई थी, लेकिन उनके अपने आंकड़े कानून की मूलभूत भ्रम या पूर्ण अवहेलना को दर्शाते हैं... उनकी स्वयं की स्वीकारोक्ति के अनुसार, 262 मामलों की जांच कार्यकारी मजिस्ट्रेट द्वारा की गईं, जबकि कानून ने स्पष्ट रूप से दो दशक पहले कार्यपालिका से यह विशेषाधिकार छीन लिया था।''
पीठ ने इस स्थिति को ''प्रणालीगत गैर-अनुपालन की एक बेहद दुखद और चौंकाने वाली तस्वीर'' करार दिया।
अदालत ने कहा कि राज्य का आचरण हिरासत में हुई मौतों की निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने के लिए संसद द्वारा विशेष रूप से अधिनियमित प्रक्रियाओं का पालन करने में ''पूर्ण विफलता'' को दर्शाता है।
पीठ ने कहा कि यह विसंगति न केवल कानून की व्यवस्थित अवहेलना को दर्शाती है, बल्कि इन अभिलेखों को बनाए रखने में राज्य की सत्यनिष्ठा और तत्परता पर भी गंभीर संदेह पैदा करती है।
उच्च न्यायालय ने इसी के साथ प्रधान जिला न्यायाधीशों और गृह, कारागार तथा आपदा प्रबंधन विभाग के प्रधान सचिव को छह महीने के भीतर एक रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया, जिसमें न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा हिरासत में हुई कम से कम 262 मौतों के मामलों की जांच नहीं कराने के कारणों को जिक्र हो।
पीठ ने उन्हें यह भी निर्देश दिया कि वे ''ऐसी चूक के लिए जिम्मेदार उक्त अधिकारियों की पहचान करें और कारण बताएं कि यह न्यायालय उनके खिलाफ विभागीय जांच शुरू करने की सिफारिश क्यों न करे।''
अदालत ने राज्य द्वारा कुछ मामलों को न्यायिक मजिस्ट्रेट को सौंपने और अन्य मामलों की जांच कार्यकारी मजिस्ट्रेट को भेजने की 'चुनिंदा' पद्धति अपनाने की भी आलोचना की।
पीठ ने इसी के साथ गृह विभाग को दो महीने के भीतर 2018 से लेकर अब तक हिरासत में हुई उन सभी मौतों की जिलावार सूची तैयार करने को कहा, जिनकी जांच कार्यकारी मजिस्ट्रेट द्वारा की गई थी।
उच्च न्यायालय ने मुख्य सचिव और गृह विभाग के प्रधान सचिव को 30 दिनों के भीतर सभी जिला मजिस्ट्रेट और पुलिस अधीक्षकों को परिपत्र जारी करने का आदेश दिया, जिसमें यह स्पष्ट किया गया हो कि जांच का अधिकार 'पूरी तरह और विशेष रूप से' न्यायिक मजिस्ट्रेट के पास है।
पीठ ने जिला पीड़ित मुआवजा समितियों को निर्देश दिया कि वे उन मामलों में स्वतः संज्ञान लेते हुए मुआवजे पर विचार करें जहां जांच में हिरासत में हिंसा, लापरवाही या अप्राकृतिक मौत की जानकारी मिली है, ताकि शोक संतप्त परिवारों को लंबे समय तक चलने वाले मुकदमेबाजी में न उलझाया जाए।
भाषा धीरज प्रशांत
प्रशांत
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