एक साथी के विवाह की आयु से कम उम्र होने पर होने पर संरक्षण नहीं दिया जा सकता:अदालत
राजकुमार
- 14 May 2026, 10:40 PM
- Updated: 10:40 PM
प्रयागराज (उप्र), 14 मई (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने सहजीवन संबंध के एक मामले में कहा है कि यदि एक साथी की आयु, विवाह के लिए निर्धारित आयु से कम है तो संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत असाधारण क्षेत्राधिकार का प्रयोग करते हुए इस संबंध को संरक्षण नहीं दिया जा सकता।
दंपति की रिट याचिका खारिज करते हुए न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद ने कहा, "ऐसे मामले में माता-पिता, अभिभावकों या बाल विवाह निषेध अधिकारियों समेत वैधानिक प्राधिकरण को बाल विवाह रोधी कानून, 2006 और अन्य लागू कानूनों के मुताबिक कानूनी कदम उठाने से नहीं रोका जा सकता।"
मौजूदा मामले में प्रथम याचिकाकर्ता एक मुस्लिम युवती है जिसकी आयु करीब 20 वर्ष है। दूसरा याचिकाकर्ता अनुसूचित जाति का एक हिंदू युवक है जिसकी आयु करीब 19 वर्ष है।
याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि वे सहजीवन संबंध में रह रहे हैं तथा उन्हें महिला का पिता धमकी दे रहा है, जबकि युवक के परिवार को उनसे कोई समस्या नहीं है।
याचिकाकर्ताओं ने सुरक्षा और स्वतंत्रता की मांग करते हुए उच्च न्यायालय का रुख किया।
अदालत के समक्ष प्रश्न खड़ा हुआ कि क्या सहजीवन संबंध में रह रहे ऐसे युगल को सुरक्षा दी जा सकती है जिसमें युवक की आयु 21 वर्ष से कम है और विवाह के उद्देश्य से वह कानून की नजर में अल्पवयस्क है।
अदालत ने कहा कि भारत में हिंदू विवाह अधिनियम, 1955, विशेष विवाह अधिनियम, 1954 और बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 विवाह पर लागू होते हैं और इनमें पुरुषों के लिए न्यूनतम आयु 21 वर्ष और महिलाओं के लिए न्यूनतम आयु 18 वर्ष है।
अदालत ने कहा कि बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 के तहत 21 वर्ष की आयु से कम के पुरुष और 18 वर्ष की आयु से कम की महिला को बालक या बालिका माना जाता है।
न्यायमूर्ति प्रसाद ने कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम भी विवाह की आयु की व्यवस्था देती है और आयु समेत विभिन्न प्रावधानों का उल्लंघन करने के लिए दंड का प्रावधान है।
अदालत ने कहा कि जब बाल विवाह प्रतिबंधित है तो यह अदालत न्यायिक आदेश के जरिए ऐसे विवाह में हस्तक्षेप करने से माता पिता को नहीं रोक सकती।
न्यायमूर्ति प्रसाद ने कहा कि लेकिन माता पिता या परिजन धमकी, हिंसा, जबरदस्ती या अवैध रूप से बंधक बनाने का सहारा नहीं ले सकते।
अदालत ने कहा कि वहीं दूसरी ओर, माता पिता या परिजनों को कानूनी कदम उठाने से नहीं रोका जा सकता जैसे वे पुलिस से संपर्क कर सकते हैं, बाल विवाह निषेध अधिकारी को सूचना दे सकते हैं या सक्षम मजिस्ट्रेट के समक्ष मुकदमा दायर कर सकते हैं।
याचिकाकर्ता संख्या दो को बालक करार देते हुए अदालत ने चार मई के अपने आदेश में कहा कि चूंकि याचिका में किसी विशेष धमकी का उल्लेख नहीं है, यह अदालत रिट याचिका खारिज करती है।
हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन जीने और निजी स्वतंत्रता के अधिकार) के तहत अपने अधिकारों को नुकसान के खिलाफ संरक्षण के हकदार हैं।
भाषा सं राजेंद्र राजकुमार
राजकुमार
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