अंटार्कटिका की बर्फ में दबी तारों की धूल से सौर मंडल के 80 हजार वर्ष पुराने इतिहास के संकेत मिले
माधव
- 14 May 2026, 05:46 PM
- Updated: 05:46 PM
( डोमिनिक कॉल, ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी के परमाणु भौतिकी विभाग में मानद प्राध्यापक )
ब्रिस्बेन, 14 मई (द कन्वरसेशन) वैज्ञानिकों ने अंटार्कटिका की प्राचीन बर्फ में दबी तारों की धूल का अध्ययन कर सौर मंडल के पिछले 80 हजार वर्षों के इतिहास से जुड़े महत्वपूर्ण संकेत मिलने का दावा किया है।
शोधकर्ताओं के अनुसार, इस अध्ययन से यह समझने में मदद मिल सकती है कि सौर मंडल अपनी आकाशगंगा के भीतर किस प्रकार के अंतरिक्ष वातावरण से गुजरता रहा है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि अंतरिक्ष केवल तारों, ग्रहों और चंद्रमाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका बड़ा हिस्सा गैस, प्लाज्मा और तारों की धूल से बने बादलों से भरा हुआ है। हमारी आकाशगंगा के स्थानीय क्षेत्र में ऐसे लगभग 15 'इंटरस्टेलर' बादल मौजूद हैं और सौर मंडल वर्तमान में इनमें से एक 'लोकल इंटरस्टेलर क्लाउड' से गुजर रहा है।
शोधकर्ताओं के अनुसार, इन बादलों की उत्पत्ति और इतिहास तारों के जन्म और विस्फोट से गहराई से जुड़ा हुआ है। उनके प्रभाव पृथ्वी पर भी देखे जा सकते हैं, विशेष रूप से अंटार्कटिका की बर्फ में संरक्षित कणों के रूप में।
वैज्ञानिकों की एक टीम ने पुराने हिमपात और बर्फ में दबी तारों की धूल का अध्ययन कर सौर मंडल और उसके आसपास के अंतरिक्षीय वातावरण के इतिहास का पता लगाने की कोशिश की। यह अध्ययन प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका 'फिजिकल रिव्यू लेटर्स' में प्रकाशित हुआ है।
अध्ययन में दावा किया गया है कि सामान्यतः खगोल विज्ञान में दूरस्थ तारों और आकाशगंगाओं से आने वाले प्रकाश का अध्ययन किया जाता है, लेकिन इस शोध में वैज्ञानिकों ने पृथ्वी पर मौजूद तारों के विस्फोटों के अवशेषों का विश्लेषण किया।
विशाल तारे अपने जीवन के अंत में 'सुपरनोवा' विस्फोट के दौरान कार्बन, ऑक्सीजन, कैल्शियम और लोहे जैसे तत्व अंतरिक्ष में छोड़ते हैं। इसी प्रक्रिया में 'आयरन-60' नामक दुर्लभ रेडियोधर्मी समस्थानिक भी बनता है, जो तारों के विस्फोटों का महत्वपूर्ण संकेतक माना जाता है।
ये सूक्ष्म धूल कण आकाशगंगा में फैलते हुए कभी-कभी पृथ्वी तक पहुंच जाते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, अंटार्कटिका की बर्फ की परतें हजारों वर्षों तक लगभग बिना किसी व्यवधान के जमा होती रहती हैं और इनमें उस समय के अंतरिक्षीय वातावरण के संकेत सुरक्षित रह जाते हैं।
शोधकर्ताओं ने पहले अंटार्कटिका की 500 किलोग्राम ताजा बर्फ में आयरन-60 की मौजूदगी पाई थी। इसके बाद उन्होंने 40 हजार से 80 हजार वर्ष पुरानी लगभग 300 किलोग्राम बर्फ का विस्तृत विश्लेषण किया।
इस प्रक्रिया के तहत बर्फ को पिघलाया गया और रासायनिक उपचार के जरिए उसमें मौजूद आयरन-60 को अलग किया गया। इसके बाद ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी की 'हेवी-आयन एक्सेलरेटर फैसिलिटी' में अत्यंत संवेदनशील 'एक्सेलरेटर मास स्पेक्ट्रोमेट्री' तकनीक का उपयोग कर आयरन-60 के परमाणुओं की गणना की गई।
वैज्ञानिकों को उम्मीद थी कि आयरन-60 का स्तर पहले के अध्ययनों के अनुरूप होगा, लेकिन इसकी मात्रा अपेक्षा से कम पाई गई। शोधकर्ताओं के अनुसार, इसका मतलब यह हो सकता है कि उस अवधि में पृथ्वी तक तारों की धूल कम पहुंच रही थी।
अध्ययन में कहा गया है कि यह परिवर्तन अपेक्षाकृत कम खगोलीय समयावधि में हुआ, इसलिए इसका संबंध करोड़ों वर्ष पहले हुए बड़े सुपरनोवा विस्फोटों से नहीं माना जा सकता। वैज्ञानिकों का मानना है कि इसके पीछे स्थानीय 'इंटरस्टेलर' बादलों की संरचना और घनत्व जिम्मेदार हो सकते हैं।
शोधकर्ताओं ने यह भी उल्लेख किया कि हालिया खगोलीय अध्ययनों के अनुसार, सौर मंडल 40 हजार से 1.24 लाख वर्ष पहले के बीच 'लोकल इंटरस्टेलर क्लाउड' में प्रवेश कर चुका था। अंटार्कटिका की बर्फ में मिले परिणाम इसी समयावधि से मेल खाते हैं।
हालांकि, वैज्ञानिकों ने यह भी कहा कि यदि ये बादल फट चुके किसी तारे से सीधे बने होते, तो बर्फ में आयरन-60 की मात्रा कहीं अधिक होनी चाहिए थी। ऐसे में इन बादलों की वास्तविक उत्पत्ति अभी भी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि यदि भविष्य में और अधिक पुरानी बर्फ का अध्ययन किया जाए तो स्थानीय 'इंटरस्टेलर' बादलों के इतिहास, संरचना और उत्पत्ति के बारे में अधिक स्पष्ट जानकारी प्राप्त हो सकती है।
द कन्वरसेशन मनीषा माधव
माधव
1405 1746 ब्रिस्बेन