नफरती भाषणों के मुद्दे से निपटने के लिए वर्तमान कानून पर्याप्त, हस्तक्षेप की जरूरत नहीं: न्यायालय
माधव
- 29 Apr 2026, 08:15 PM
- Updated: 08:15 PM
नयी दिल्ली, 29 अप्रैल (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को कहा कि नफरत फैलाने वाले भाषणों के मुद्दे से निपटने के लिए मौजूदा आपराधिक कानून पर्याप्त हैं, इसीलिए इसमें हस्तक्षेप की कोई आवश्यकता नहीं है।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने नफरती भाषण से संबंधित याचिकाओं पर अपने फैसले में कहा कि यह कहना सही नहीं है कि नफरती भाषण से निपटने के लिए कोई कानून नहीं है।
न्यायालय ने नफरती भाषणों में शामिल लोगों के खिलाफ कार्रवाई और ऐसे मामलों से निपटने के लिए एक तंत्र बनाने के अनुरोध वाली याचिकाओं पर अपना फैसला सुनाया।
पीठ ने कहा कि उभरती सामाजिक चुनौतियों के आलोक में नये कानून बनाना या पुराने कानूनों में बदलाव करना केंद्र और विधायिका पर निर्भर है। पीठ ने कहा कि वे चाहें तो विधि आयोग की मार्च 2017 की 267वीं रिपोर्ट में दिये गए सुझावों के तहत संशोधन करने पर भी विचार कर सकते हैं।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने फैसला सुनाते हुए कहा, ''हम उस प्रकार के निर्देश जारी करने से इनकार करते हैं, जिसका अनुरोध किया गया है लेकिन हम यह कहना उचित समझते हैं कि नफरत फैलाने वाले भाषण और अफवाह फैलाने से संबंधित मुद्दा भाईचारे, गरिमा और संवैधानिक व्यवस्था के संरक्षण से सीधे तौर पर जुड़ा है।''
पीठ ने कहा कि अपराध तय करना और दंड का निर्धारण पूरी तरह से विधायिका के अधिकार क्षेत्र में आता है।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने कहा कि संविधान के अनुसार न्यायपालिका कानून नहीं बना सकती और ना ही अपराधों की परिभाषा को अपने आदेशों से व्यापक कर सकती है।
पीठ ने कहा, ''इस न्यायालय के पूर्व निर्णयों से लगातार इसकी पुष्टि होती है कि संवैधानिक अदालतें कानून की व्याख्या कर सकती हैं और मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन को सुनिश्चित करने के लिए निर्देश जारी कर सकती हैं, लेकिन वे कानून नहीं बना सकतीं या कानून बनाने के लिए बाध्य नहीं कर सकतीं।''
पीठ ने कहा कि आपराधिक कानून का मौजूदा ढांचा, जिसमें पूर्ववर्ती भारतीय दंड संहिता और संबंधित कानून शामिल हैं, शत्रुता को बढ़ावा देने, धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने या सार्वजनिक शांति भंग करने वाले कृत्यों से पर्याप्त रूप से निपटता है।
पीठ ने कहा कि पूर्ववर्ती दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) और अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस), 2023 के तहत वैधानिक ढांचा मौजूद है, जिससे किसी अपराध पर कानूनी कार्रवाई शुरू की जा सकती है।
पीठ ने कहा कि संज्ञेय अपराध का खुलासा होने पर प्राथमिकी दर्ज करना पुलिस का अनिवार्य कर्तव्य है और प्राथमिकी दर्ज नहीं करने की स्थिति में सीआरपीसी या बीएनएसएस प्रभावी उपाय प्रदान करते हैं।
न्यायालय ने कई याचिकाएं खारिज कर दीं और कुछ राज्यों के अधिकारियों के खिलाफ दायर की गई अलग-अलग अवमानना याचिकाओं को भी बंद कर दिया, जिनमें उन पर घृणास्पद भाषणों में शामिल लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने के न्यायालय के निर्देशों का पालन करने में कथित विफलता का आरोप लगाया गया था।
उच्चतम न्यायालय ने 20 जनवरी को इन याचिकाओं पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था और टिप्पणी की थी कि वह 2021 से लंबित नफरती भाषणों से जुड़ी अधिकती याचिकाओं को बंद कर देगा, जिनमें अदालत ने पुलिस को स्वतः संज्ञान लेकर प्राथमिकी दर्ज करने के निर्देश दिए थे।
भाषा आशीष माधव
माधव
2904 2015 दिल्ली