इस्लाम में महिलाओं को नमाज के लिए मस्जिद आने पर कोई पाबंदी नहीं: एआईएमपीएलबी ने न्यायालय में कहा
पवनेश
- 23 Apr 2026, 10:29 PM
- Updated: 10:29 PM
नयी दिल्ली, 23 अप्रैल (भाषा) 'ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड' (एआईएमपीएलबी) ने बृहस्पतिवार को उच्चतम न्यायालय में कहा कि इस्लाम महिलाओं को नमाज के लिए मस्जिद आने से प्रतिबंधित नहीं करता है, लेकिन उनका घर पर ही रहना उचित है।
एआईएमपीएलबी की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता एम. आर. शमशाद ने प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ को बताया कि कुछ अनुशासन के अधीन महिलाओं को मस्जिद में नमाज अदा करने की अनुमति है।
उन्होंने बताया कि यह मुद्दा पीठ के समक्ष इसलिए आया है कि एक रिट याचिका दायर की गई थी, जिसमें महिलाओं को मस्जिद में नमाज अदा करने की अनुमति देने का अनुरोध किया गया था।
उन्होंने यह दलील दी कि मस्जिद में कोई गर्भ गृह नहीं होता।
पीठ में न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना, न्यायमूर्ति एम एम सुंदरेश, न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, न्यायमूर्ति अरविंद कुमार, न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी वराले, न्यायमूर्ति आर महादेवन और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची शामिल हैं।
एआईएमपीएलबी के वकील ने पीठ को बताया कि यह बेहतर होगा कि महिलाएं घर पर ही नमाज अदा करें और उन्हें मस्जिद में नमाज अदा करने वाले पुरुषों के समान ही पुण्य प्राप्त होंगे।
हस्तक्षेप करते हुए न्यायमूर्ति अमानुल्लाह ने कहा कि इसका कारण यह है कि यदि घर के सभी सदस्य मस्जिद चले जाएंगे, तो बच्चों की देखभाल कौन करेगा?
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि इस्लाम में महिलाओं के लिए मस्जिद में सामूहिक नमाज में शामिल होना अनिवार्य नहीं है।
शमशाद ने कहा कि कुरान में पैगंबर का अनुसरण करने का आह्वान किया गया है और हदीसों में उपासना के तौर-तरीकों का उल्लेख किया गया है।
उन्होंने दलील दी कि न्यायालयों को धार्मिक प्रथाओं की प्रकृति का न्यायिक निर्धारण करने का प्रयास नहीं करना चाहिए। उन्होंने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 25 के अनुसार, धार्मिक प्रथा या धार्मिक प्रथाओं के मूल तत्व की व्याख्या करने का कार्य धर्म या धार्मिक संप्रदायों के विद्वानों और/या उस विशेष धर्म के विद्वानों पर छोड़ दिया जाना चाहिए।
उन्होंने दलील दी, ''इस्लाम के शुरुआती 400 वर्षों में, इस्लाम में आवश्यक धार्मिक प्रथाओं को भी इज्मा (उलेमाओं की आम सहमति) के माध्यम से घोषित किया गया था। इसका प्रयोग उन मामलों में किया जाता था जहां कुरान में कुछ अस्पष्ट संकेत दिए गए हों...और विभिन्न वर्गों के बीच गंभीर मतभेदों को सुलझाने के लिए किया जाता था।''
शमशाद ने दलील दी, ''मस्जिद वास्तव में इस्लाम का अभिन्न अंग है। मुद्दा यह नहीं है कि मस्जिद अनिवार्य है या नहीं। लेकिन जब न्यायालय का बहुमत वाला फैसला आया, तो उसमें कहा गया कि चूंकि नमाज खुले में अदा की जा सकती है, इसलिए मस्जिद अनिवार्य नहीं है। यह मापदंड पूरी तरह गलत है। इसे कई फैसलों में लागू किया गया है। मस्जिद मुसलमानों की आस्था का केंद्र है। सभी प्रथाएं अंततः मस्जिद से जुड़ी हुई हैं।''
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि यह कहना वैसा ही है जैसे यह कहना कि हिंदू धर्म के लिए मंदिर आवश्यक नहीं है।
उच्चतम न्यायालय ने यह भी कहा कि वह सभी प्रतिष्ठित लेखकों और विचारकों के विचारों का सम्मान करता है, लेकिन वह 'व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी' से मिली जानकारी स्वीकार नहीं कर सकता।
नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने यह टिप्पणी उस समय की, जब वह केरल के शबरिमला मंदिर सहित धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव और विभिन्न धर्मों द्वारा अपनाई जाने वाली धार्मिक स्वतंत्रता की सीमा एवं दायरे से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी।
दाऊदी बोहरा समुदाय के प्रमुख की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल ने कांग्रेस नेता शशि थरूर द्वारा लिखे गए एक लेख का हवाला दिया, जिसमें धार्मिक राहत से जुड़े मामलों में न्यायिक संयम की बात कही गई थी।
इस पर प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा, ''हम सभी प्रतिष्ठित व्यक्तियों, विधिवेत्ताओं आदि का सम्मान करते हैं, लेकिन व्यक्तिगत राय, व्यक्तिगत राय ही होती है।''
सुनवाई 28 अप्रैल को भी जारी रहेगी।
सितंबर 2018 में पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 4:1 के बहुमत से फैसला सुनाते हुए 10 से 50 वर्ष आयु वर्ग की महिलाओं के शबरिमला अयप्पा मंदिर में प्रवेश पर लगे प्रतिबंध को हटा दिया था और कहा था कि सदियों पुरानी यह हिंदू धार्मिक प्रथा अवैध और असंवैधानिक है।
भाषा सुभाष पवनेश
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