कंपनियों के स्वतंत्र निदेशकों को 'रचनात्मक दृष्टिकोण' अपनाने की जरूरतः सेबी चेयरमैन
अजय
- 06 Apr 2026, 05:01 PM
- Updated: 05:01 PM
मुंबई, छह अप्रैल (भाषा) बाजार नियामक सेबी के चेयरमैन तुहिन कांत पांडेय ने सोमवार को किसी कंपनी के कामकाज में स्वतंत्र निदेशकों की भूमिका को बेहद अहम बताते हुए कहा कि उन्हें अपने दायित्व निभाते समय 'रचनात्मक दृष्टिकोण' अपनाने की जरूरत है।
पांडेय की यह टिप्पणी अतनु चक्रवर्ती के एचडीएफसी बैंक से हालिया इस्तीफे के कुछ सप्ताह बाद आई है। वह एचडीएफसी बैंक के स्वतंत्र निदेशक और अंशकालिक चेयरमैन थे। मूल्यों और नैतिकता में असंगति का हवाला देते हुए दिए गए चक्रवर्ती के अचानक इस्तीफे के बाद बैंक के शेयर में खासी गिरावट आई है।
भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) के चेयरमैन ने यहां संवाददाताओं से बातचीत में कहा कि स्वतंत्र निदेशकों की भूमिका केवल अनुपालन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें प्रबंधन से मिलने वाली जानकारी और विश्लेषण का आकलन, कंपनी संचालन, जोखिम प्रबंधन और वित्तीय मामलों की निगरानी भी शामिल है।
उन्होंने एचडीएफसी बैंक प्रकरण के बारे में पूछे जाने पर कहा, "इस तरह के मुद्दों पर चर्चा निदेशक मंडल के भीतर होना जरूरी है। लेकिन इसके लिए रचनात्मक दृष्टिकोण भी होना चाहिए। कंपनी के प्रदर्शन और बाजार पूंजीकरण का सीधा असर शेयरधारकों और अन्य हितधारकों पर पड़ता है।"
इससे पहले सेबी प्रमुख ने भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) के एक कार्यक्रम में कहा कि स्वतंत्र निदेशकों के लिए स्वतंत्रता अपने आप में अंतिम लक्ष्य नहीं, बल्कि एक शुरुआत है।
उन्होंने कहा, ''स्वतंत्र निदेशक केवल अनुपालन सुनिश्चित करने और कंपनी प्रबंधन की आलोचना के लिए ही नहीं होते हैं, बल्कि जवाबदेही के साथ समाधान खोजने और कंपनी का समर्थन करने की भी जिम्मेदारी निभाते हैं। उन्हें अपने जेहन में यह जिम्मेदारी रखने की जरूरत है।''
उन्होंने स्वतंत्र निदेशकों के लिए क्षमता निर्माण की जरूरत पर बल देते हुए कहा कि सेबी इस दिशा में अन्य हितधारकों- जैसे नियामक, उद्योग संगठन, पेशेवर निकाय और शैक्षणिक संस्थानों के साथ मिलकर पहल करेगा।
पांडेय ने कहा कि निदेशक मंडल अब प्रौद्योगिकी, डेटा प्रबंधन, साइबर जोखिम, जटिल वित्तीय ढांचे और बदलते नियामकीय माहौल जैसे मुद्दों को देख रहे हैं लिहाजा हर निदेशक से सभी क्षेत्रों में विशेषज्ञता की अपेक्षा करना व्यावहारिक नहीं है। इसलिए निरंतर, संरचित और सहयोगात्मक प्रशिक्षण जरूरी है।
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