आबकारी नीति मामला: अदालत ने सीबीआई के जांच अधिकारी के खिलाफ विभागीय जांच का निर्देश दिया
माधव
- 27 Feb 2026, 08:43 PM
- Updated: 08:43 PM
नयी दिल्ली, 27 फरवरी (भाषा) दिल्ली की एक अदालत ने शुक्रवार को पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और 22 अन्य को आबकारी नीति मामले में आरोपमुक्त कर दिया और एक लोकसेवक को फंसाने को लेकर केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) के जांच अधिकारी (आईओ) के खिलाफ विभागीय जांच की अनुशंसा की।
विशेष न्यायाधीश जितेंद्र सिंह ने जांच में हुई खामियों को उजागर करते हुए अपने 598 पृष्ठों के आदेश में कहा, ''अदालत का कर्तव्य गढ़ी गई जांच सामग्री को खारिज करना भर ही नहीं है, बल्कि आरोपी संख्या 1 (कुलदीप सिंह) को आरोपी के रूप में फंसाने के लिए दोषी जांच अधिकारी (आईओ) के खिलाफ उचित विभागीय कार्यवाही शुरू करने की अनुशंसा करना भी है।''
इससे पहले, फैसले के मुख्य अंश को सुनाते हुए, न्यायाधीश ने सीबीआई के जांच अधिकारी के खिलाफ विभागीय जांच की अनुशंसा करते हुए कहा कि सिंह के खिलाफ ''कोई सबूत नहीं'' है।
न्यायाधीश के आदेश में कहा गया कि सिंह, जो आबकारी/भारत निर्मित विदेशी शराब के पूर्व उपायुक्त थे, के खिलाफ कोई सबूत न होने के कारण ऐसी जांच (आईओ के विरुद्ध) आवश्यक है, और यह कार्रवाई ''जवाबदेही तय करने और जांच करने वाले तंत्र की संस्थागत विश्वसनीयता बनाए रखने'' के लिए जरूरी है।
अदालत ने दोष सिद्ध करने वाले सबूतों के अभाव में सिंह सहित अन्य लोक सेवकों को आरोपी बनाये जाने और उनके अभियोजन को मंजूरी प्रदान करने पर आश्चर्य जताया।
न्यायाधीश ने कहा, ''जिस तरह से जांच की गई है, वह निष्पक्ष और कानूनी जांच के अनुशासन के अनुरूप होने के बजाय, कानून के शासन के मूलभूत सिद्धांतों पर एक सुनियोजित और निरंतर हमले को उजागर करती है।''
उन्होंने कहा कि यह ''चिंताजनक'' है कि एक व्यक्ति को संदिग्धों की सूची में रखा गया और साथ ही, आरोप पत्र दाखिल करने के दौरान उसे अभियोजन पक्ष के गवाह के रूप में पेश किया गया।
न्यायाधीश ने कहा, ''अपने-आप में विरोधाभासी रहे इस रुख को महज प्रक्रियात्मक अनियमितता कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। यह एक सोची-समझी रणनीति को दर्शाता है जिसके तहत जांच अधिकारी ने जानबूझकर मामले को अस्पष्ट बनाए रखने की कोशिश की और अभियोजन पक्ष के मामले को मजबूत करने के लिए उक्त व्यक्ति के बयान का सहारा लिया। साथ ही, यदि मामला न्यायिक जांच में विफल रहता तो उस व्यक्ति को फंसाने का विकल्प भी बचा कर रखा गया था।''
उन्होंने कहा कि इस तरह की स्थिति से स्पष्ट रूप से पता चलता है कि जांच अधिकारी शुरू से ही ''आरोपों की अंतर्निहित कमजोरी'' से अवगत थे और उन्हें आशंका थी कि अदालत के समक्ष प्रस्तुत किया गया मामला गहन न्यायिक जांच में खरा नहीं उतरेगा।
न्यायाधीश ने कहा, ''जांच अधिकारी से रणनीतिक चतुराई की अपेक्षा नहीं की जाती। उनसे अपेक्षा की जाती है कि वह स्पष्टवादिता, निष्पक्षता और तथ्यों के प्रति अटूट निष्ठा के साथ मामले में आगे बढ़ें।''
भाषा सुभाष माधव
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