न्यायालय ने 2021 के मामले को किया बंद, एनजीटी को नदियों के प्रदूषण से जुड़ा मामला खोलने का निर्देश
रंजन
- 24 Feb 2026, 09:09 PM
- Updated: 09:09 PM
नयी दिल्ली, 24 फरवरी (भाषा) स्वच्छ जल के अधिकार को मौलिक अधिकार बताते हुए, उच्चतम न्यायालय ने प्रदूषित नदियों के पानी को साफ करने पर 2021 की अपनी स्वतः संज्ञान कार्यवाही को मंगलवार को बंद कर दिया। शीर्ष अदालत ने राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) की प्रधान पीठ को मामले को फिर से खोलने और निरंतर निगरानी सुनिश्चित करने का निर्देश भी दिया।
सुनवाई की शुरुआत में, शीर्ष अदालत ने 13 जनवरी 2021 के अपने उस आदेश पर गौर किया, जिसमें अपशिष्ट के कारण नदियों के जल दूषित होने का स्वतः संज्ञान लेते हुए समानांतर कार्यवाही शुरू करने का आदेश दिया गया था, जबकि नयी दिल्ली स्थित राष्ट्रीय हरित अधिकरण पहले से ही इसी तरह के मामले पर विचार कर रहा था।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा, ''क्या इस अदालत द्वारा सभी प्रदूषित नदियों का जायजा लेना संभव है? हम एक-एक करके देख सकते हैं। हम इतने सारे मामलों पर सुनवाई करते हैं और निर्देश जारी करते हैं... हमें यह भी देखना होगा कि हम मामलों पर एक साथ सुनवाई करें। इस तरह के अनेक मामलों की क्या आवश्यकता है?''
पीठ ने यह टिप्पणी उस वक्त की, जब केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) की ओर से पेश हुईं अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने अधिकरण के समक्ष इसी तरह के एक लंबित मामले का जिक्र किया।
सॉलिसिटर जनरल ने पीठ से विचार करने का आग्रह किया कि क्या वह सुनवाई जारी रखना चाहती है या सुनवाई को पुनः शुरू करने का अधिकरण को निर्देश जारी किया जा सकता है।
दोनों पक्षों की दलील कुछ समय तक सुनने के बाद, पीठ ने अधिकरण को मामले को फिर से खोलने का निर्देश दिया और इस बात पर जोर दिया कि नदियों को बचाने के लिए आवश्यक निरंतर निगरानी के लिए एक विशेष निकाय (हरित अधिकरण) कहीं अधिक सक्षम है।
न्यायालय ने कहा, ''हमें लगता है कि स्वतः संज्ञान लेने के बजाय, इस न्यायालय को अधिकरण से यह सुनिश्चित करने के लिए कहना चाहिए था कि स्थिति में सुधार होने तक निर्देशों का पालन किया जाए। हरित अधिकरण ही एकमात्र उपाय नहीं है और इस न्यायालय के पास न्यायिक समीक्षा की अपीलीय शक्तियां हैं।''
पीठ ने कहा, ''उपरोक्त तथ्यों के आलोक में, हमारा यह मानना है कि स्वतः संज्ञान वाली कार्यवाही बंद कर दी जाए और अधिकरण के समक्ष कार्यवाही पुनः शुरू करने की अनुमति दी जाए।''
न्यायालय ने उल्लेख किया कि दिल्ली में यमुना नदी में बढ़ते प्रदूषण से संबंधित एक मामला जब 2021 में उसके समक्ष आया था, स्वतः संज्ञान लेते हुए कार्यवाही शुरू की गई थी।
शीर्ष अदालत ने कहा कि उसने पहले यमुना नदी के प्रदूषण पर विचार किया था और उत्तराखंड, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और केंद्र सरकार को नोटिस जारी किए थे।
पीठ ने कहा, ''इसमें कोई संदेह नहीं है कि स्वच्छ पर्यावरण और स्वच्छ जल के साथ मानवीय गरिमापूर्ण स्वच्छ वातावरण में रहने का अधिकार अनुच्छेद 21 में निहित है... जल प्रदूषण के मानव स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव ने इस न्यायालय का ध्यान आकर्षित किया।''
न्यायालय ने कहा, ''विधायी योजना (जल) के तहत, सीपीसीबी (केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड) और एसपीसीबी (राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड) को यह सुनिश्चित करने के लिए सभी आवश्यक उपाय करने का वैधानिक दायित्व सौंपा गया है कि सीवेज अपशिष्ट को नदियों में तब तक न छोड़ा जाए, जब तक कि उसका पूर्ण शोधन न हो जाए तथा वह जल की गुणवत्ता को खराब न करे।''
पीठ ने कहा कि अधिकरण न्यायिक और अर्ध-न्यायिक कर्तव्यों का निर्वहन करने के लिए सशक्त है।
न्यायालय ने कहा, ''कार्यवाही के लंबित रहते हुए काफी समय बीत चुका है। नवीनतम आदेश के अभाव में, हम आश्वस्त नहीं हैं कि यमुना के जल की स्थिति में सुधार हुआ है या नहीं। ''
पीठ ने कहा, ''निर्देश जारी करने मात्र से एनजीटी की जिम्मेदारी समाप्त नहीं हो जाती। यह एक सतत प्रक्रिया होनी चाहिए जिसमें राज्य सरकारों, केंद्र सरकार और निजी संस्थाओं को हरित अधिकरण के कानून या निर्देशों का पालन करना होगा। एनजीटी के लिए यह अनिवार्य है कि वह अनुपालन को बढ़ावा देने के लिए वस्तु स्थिति रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दे।''
सभी पक्षों की बात कुछ समय तक सुनने के बाद, पीठ ने एनजीटी को मामले को फिर से खोलने का निर्देश दिया।
प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ''अधिकरण ने 2021 में मामले को बंद करके एक गंभीर गलती की... वे इसे बंद करने में भी जल्दबाजी कर रहे हैं।'' उन्होंने कहा कि निर्देश जारी कर देने भर से ही अधिकरण की जिम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती।
भाषा सुभाष रंजन
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