कोलकाता में चार सीट पर एसआईआर की एलडी सूची में मुस्लिमों की संख्या आनुपातिक रूप से अधिक:अध्ययन
संतोष
- 12 Feb 2026, 09:30 PM
- Updated: 09:30 PM
कोलकाता, 12 फरवरी (भाषा) हाल में प्रकाशित एक अध्ययन ने कोलकाता की मतदाता सूची संशोधन प्रक्रिया में एक "चौंकाने वाली विसंगति" की ओर इशारा किया है, जिसमें दावा किया गया है कि मौजूदा एसआईआर के दौरान चार विधानसभा सीटों पर तार्किक विसंगति (एलडी) संबंधी सूचियों में मुसलमानों की संख्या आनुपातिक रूप से अधिक पाई गई है।
बालीगंज, कोलकाता पोर्ट, मेतियाब्रुज और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के निर्वाचन क्षेत्र भाबनीपुर में एलडी सूचियों के अध्ययन से पता चलता है कि इस श्रेणी के तहत चिह्नित मुस्लिम-पहचान योग्य नामों का प्रतिशत इन निर्वाचन क्षेत्रों की जनसंख्या में उनके अनुमानित हिस्से से कहीं अधिक है।
यह शोध कोलकाता स्थित साबर इंस्टीट्यूट द्वारा किया गया है, जो सामाजिक असमानताओं को दूर करने पर काम करता है।
अध्ययन के निष्कर्षों पर प्रतिक्रिया के लिए पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) के कार्यालय से कई बार संपर्क करने की कोशिश की की गई, लेकिन वे इस खबर को लिखे जाने तक उपलब्ध नहीं हुए।
ये निष्कर्ष मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की कवायद की पृष्ठभूमि में आए हैं, जिसके परिणामस्वरूप राज्य भर में अनुपस्थित, स्थायी रूप से स्थानांतरित, मृत और नाम के दोहराव (एएसडीडी) श्रेणी के तहत 58.2 लाख से अधिक नाम पहले ही बाहर कर दिए गए हैं, जिससे पश्चिम बंगाल के मतदाताओं की संख्या 7.66 करोड़ से घटकर 7.08 करोड़ हो गई है।
एसआईआर का दूसरा चरण वर्तमान में जारी है और इसमें जांच के दायरे में आए 1.67 करोड़ मतदाताओं की सुनवाई शामिल है, जिनमें एलडी के लिए चिह्नित 1.36 करोड़ मतदाता और लगभग 31 लाख ऐसे मतदाता शामिल हैं जिनके सत्यापन रिकॉर्ड में कमी है।
शोधकर्ता आशिन चक्रवर्ती ने कहा कि संस्थान ने सबसे पहले 16 दिसंबर की एएसडीडी की नाम हटाने वाली सूची का विश्लेषण किया, जिसमें लगभग 58 लाख नाम शामिल थे। यह इस आरोप के बीच हुआ है कि मुस्लिम मतदाताओं को असंगत रूप से मतदाता सूची से बाहर किया जा रहा था।
चक्रवर्ती ने वरिष्ठ शोधकर्ता साबिर अहमद के साथ मिलकर यह अध्ययन किया।
चक्रवर्ती ने 'पीटीआई-भाषा' को बताया, "दिसंबर में जारी की गई हटाए गए नाम की सूची में मुस्लिम नामों का अनुपात उन निर्वाचन क्षेत्रों की जनसंख्या में उनकी हिस्सेदारी के लगभग बराबर था। उस समय हमें मुस्लिमों के अत्याधिक नाम हटाने का कोई सबूत नहीं मिला।"
"असत्यापित मतदाताओं" की सूची में भी इसी तरह का पैटर्न देखने को मिला, जहां मुस्लिम प्रतिनिधित्व काफी हद तक जनसांख्यिकीय अनुपात के अनुरूप था।
उन्होंने कहा,"एलडी से संबंधित सूची की बात करें तो, हमें पूरी सूची प्राप्त नहीं हुई है। यह वेबसाइट पर अपलोड नहीं की गई है। हमने अपने सूत्रों और संसाधनों का उपयोग करके स्थानीय बीएलओ से सूचियां प्राप्त कीं। वहां हमने जो देखा, वह चिंताजनक है। कुछ मामलों में मुस्लिम नामों का अनुपात जनसंख्या में मुस्लिमों की हिस्सेदारी से दो से तीन गुना अधिक प्रतीत होता है। यह पैटर्न पिछली दो सूचियों में मौजूद नहीं था।"
भाबानीपुर में मुस्लिम आबादी लगभग 20 प्रतिशत है। अध्ययन के अनुसार, एएसडीडी और असत्यापित मतदाता सूचियों में उनकी हिस्सेदारी क्रमशः लगभग 23 प्रतिशत और 26 फीसदी थी, जबकि एलडी सूची में मुस्लिम की हिस्सेदारी लगभग 52 प्रतिशत है।
बालीगंज में, जहां अनुमानित तौर पर 50 प्रतिशत मतदाता मुस्लिम हैं, एएसडीडी और असत्यापित मतदाता सूचियों में उनकी हिस्सेदारी क्रमशः 42 प्रतिशत और 44 प्रतिशत रही। हालांकि, एलडी की सूची में यह हिस्सेदारी बढ़कर लगभग 77.5 प्रतिशत हो जाती है।
कोलकाता पोर्ट और मेतियाब्रुज, दोनों मुस्लिम बहुल निर्वाचन क्षेत्रों में यह पैटर्न स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। अध्ययन के अनुसार, कोलकाता पोर्ट में मतदाताओं का लगभग 50 प्रतिशत मुस्लिम हैं, लेकिन एलडी के अंतर्गत पंजीकृत मतदाताओं में से 82 प्रतिशत मुस्लिम हैं।
मेतियाब्रुज में, जहां मुसलमानों की आबादी लगभग 60 प्रतिशत है, एलडी सूची में उनकी हिस्सेदारी 87 फीसदी तक बताई जाती है।
तार्किक विसंगतियों में माता-पिता के नाम में कथित विसंगतियां या मतदाता और माता-पिता के बीच उम्र का असामान्य अंतर शामिल है।
तृणमूल कांग्रेस ने कहा कि निष्कर्षों से उसके इस आरोप की पुष्टि होती है कि एसआईआर कवायद "अल्पसंख्यकों और शहरी गरीब मतदाताओं को परेशान करने के लिए है।"
तृणमूल कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, "पहले तो उन्होंने कहा कि यह मृत और नाम में दोहराव वाले मतदाताओं का मामला है। अब हम देख रहे हैं कि तथाकथित एलडी सूची में अल्पसंख्यक समुदाय के नाम असंगत रूप से अधिक चिन्हित किए जा रहे हैं।"
हालांकि, भाजपा ने इस आरोप को खारिज करते हुए कहा कि एसआईआर एक "नियमित और पारदर्शी" संशोधन प्रक्रिया है।
राज्य भाजपा के एक नेता ने कहा, "निर्वाचन आयोग एक स्वतंत्र संवैधानिक निकाय है। तार्किक विसंगतियां तकनीकी मुद्दे हैं। इसे धर्म से जोड़ना तृणमूल कांग्रेस द्वारा 2026 के चुनावों से पहले मतदाताओं को ध्रुवीकृत करने का एक राजनीतिक प्रयास है।"
भाषा नोमान नरेश संतोष
संतोष
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