जलवायु परिवर्तन: बीड में महिलाएं गर्भाशय निकलवाने या आजीविका खोने के विकल्प में से चुनने को मजबूर
अमित माधव
- 11 Mar 2024, 09:36 PM
- Updated: 09:36 PM
नयी दिल्ली, 11 मार्च (भाषा) महाराष्ट्र के बीड जिले में महिलाओं को अपना गर्भाशय सर्जरी से निकलवाने या आजीविका खोने के विकल्प में से एक विकल्प चुनने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।
जलवायु परिवर्तन के चलते पड़ने वाले सूखे ने इस क्षेत्र को तबाह कर दिया है। इसने परिवारों को गरीबी में धकेल दिया है और महिलाओं को गन्ने के खेतों में काम की तलाश में पलायन करने के लिए मजबूर किया है।
इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर एनवायरनमेंट एंड डेवलपमेंट (आईआईईडी) के एक नए पेपर के अनुसार, इस श्रम की मांग की प्रकृति, शोषणकारी रोजगार स्थितियों ने महिलाओं को काम छूटने और वित्तीय दंड से बचने के लिए अपने गर्भाशय को शल्य चिकित्सा द्वारा हटाने के लिए मजबूर करती है।
लता वाघमारे गन्ना काटने का काम करने के लिए हर साल अपने पति के साथ कर्नाटक जाती हैं। लता ने कहा कि उन्होंने अपने दूसरे बच्चे को गन्ने के खेत में जन्म दिया, क्योंकि वह छुट्टी लेने के जुर्माने के कारण प्रसव के बाद छुट्टी लेने से भयभीत थीं।
उन्होंने आईआईईडी को बताया, "एक दिन का काम छोड़ने पर जुर्माना 500 रुपये से 1,000 रुपये तक है। मैं प्रसव के पांच दिन बाद काम पर वापस आ गई। अपनी बच्ची को दूध पिलाने के लिए, मैं उसे अपने साथ खेत में ले गई।"
उन्होंने कहा, "गन्ने के गट्ठर ले जाते समय, मैंने उसे एक जगह रख दिया। ट्रैक्टर ने मेरे बच्चे को कुचल दिया। मैंने अपना बच्चा खो दिया।"
दलित महिला लता वाघमारे (34) शोक मनाने के लिए छुट्टी नहीं ले सकी और अगले दिन काम पर लौट आई। उन्होंने कहा, "प्रसव के बाद एक महीने तक मुझे रक्तस्राव हुआ। मार्च 2010 में, मैं बीड गई और अपना गर्भाशय निकलवा लिया। चिकित्सका ने मुझे बताया कि प्रसव के बाद भारी गट्ठर उठाने और आराम न करने के कारण रक्तस्राव हुआ।"
देश में व्यापक आक्रोश के बावजूद इस तरह से गर्भाशय निकालने की शल्यक्रिया अभी भी हो रही हैं। यह शल्यक्रिया, ज्यादातर निजी क्लीनिक में की जाती है, यह महिलाओं के लिए स्थायी दर्द और मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकती है।
शोधकर्ताओं ने "जलवायु संकट की कीमत अपने गर्भ से चुका रही महिलाएं" शीर्षक वाले पेपर के लिए बीड के दो अलग-अलग क्षेत्रों में 423 घरों का सर्वेक्षण किया। इनमें से, 253 घरों के लोगों ने चीनी उद्योग में काम करने के लिए पलायन किया।
काम के लिए पलायन करने वाले अधिकांश लोगों ने कहा कि वे फसल के मौसम के दौरान गन्ना काटते हैं। स्थानीय श्रमिक ठेकेदार आम तौर पर औपचारिक अनुबंधों के माध्यम से नहीं बल्कि अनौपचारिक समझौतों के माध्यम से जोड़े में काम करने के लिए पति-पत्नी की "जोड़ियों" को काम पर रखते हैं।
इन मजदूरों को छह महीने की फसल अवधि के दौरान एक सामान्य दिन में 12 से 16 घंटे तक तक काम करना होता है। पुरुष आमतौर पर गन्ना काटते हैं जबकि महिलाएं गट्ठर बाँधती और ढेर लगाती हैं। इन जोड़ों को अक्सर काम छूट जाने पर वेतन कटौती का सामना करना पड़ता है, जिससे वे छुट्टी लेने से डरते हैं।
बीड जिले के कठवाड़ा गांव की 45 वर्षीय जयश्री ओव्हाल ने शोधकर्ताओं को बताया, "एक समय के बाद मेरी मासिक धर्म से जुड़ी दिक्कत असहनीय हो गई। मैं बीड में एक स्त्री रोग विशेषज्ञ के पास गई, उन्होंने सुझाव दिया कि मुझे भारी सामान उठाना बंद कर देना चाहिए लेकिन वह हमारे लिए आय का एकमात्र स्रोत था। इसलिए मैंने अपना गर्भाशय निकलवाने और हर महीने होने वाले इस 'दर्द' से छुटकारा पाने का फैसला किया।"
अन्य महिलाओं ने बताया कि उनके पास सैनिटरी उत्पाद के रूप में उपयोग करने के लिए कपड़ों के अलावा कुछ भी नहीं है, जिनका उपयोग वे गन्ने के बंडलों को ढोने के लिए करती हैं।
आईआईईडी की प्रमुख शोधकर्ता रितु भारद्वाज ने कहा, "जब हम जलवायु परिवर्तन से होने वाले नुकसान और क्षति के बारे में बात करते हैं, तो हम सिर्फ न्यूयॉर्क में बाढ़ वाले अपार्टमेंट या यूनान में झुलसी पहाड़ियों के बारे में बात नहीं कर रहे हैं। ये महिलाओं के अनुभव, जलवायु परिवर्तन का भी परिणाम है, जिसने उनकी आजीविका को नष्ट कर दिया है।"
भाषा अमित