भारत ने विस्तारवाद की नीति कभी नहीं अपनाई : उपराष्ट्रपति धनखड़
सं राजेंद्र शफीक
- 07 Sep 2024, 10:05 PM
- Updated: 10:05 PM
चित्रकूट (उप्र), सात सितंबर (भाषा) उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने भारत के प्रति वैश्विक नजरिये और मूल्यों को आकार देने में भारत की प्राचीन ऋषि परंपरा के गहरे असर को शनिवार को रेखांकित किया।
उन्होंने ‘वसुधैव कुटुंबकम’ के मुख्य सिद्धांत को इस परंपरा का आधार बताते हुए कहा कि भारत ने कभी विस्तारवाद की नीति नहीं अपनाई है।
यहां जगद्गुरु रामभद्राचार्य दिव्यांग राज्य विश्वविद्यालय में “आधुनिक जीवन में ऋषि परंपरा” पर राष्ट्रीय संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए धनखड़ ने वैश्विक कूटनीति में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका पर कहा, “जी-20 शिखर सम्मेलन के दौरान दुनिया ने भारत के नेतृत्व को पहचाना, जब हमारा ध्येय वाक्य ‘एक पृथ्वी, एक परिवार, एक भविष्य’ था।
धनखड़ ने कहा, ‘‘वसुधैव कुटुंबकम में हमारी ऋषि परंपरा का सार निहित है, जिसने सहस्राब्दियों से हमारा मार्गदर्शन किया है।’’
उन्होंने भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत में निहित दो प्रमुख सिद्धांतों को विश्व मंच पर पेश करने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व की सराहना की।
उपराष्ट्रपति ने प्रथम सिद्धांत को रेखांकित करते हुए कहा कि भारत ने कभी भी विस्तारवाद की नीति का समर्थन नहीं किया अथवा दूसरों की भूमि के प्रति लालसा की भावना नहीं रखी।
वहीं, दूसरे सिद्धांत की ओर इंगित करते हुए, उपराष्ट्रपति ने कहा, ‘‘किसी भी संकट में युद्ध समाधान नहीं है। समाधान का केवल एक ही रास्ता है, बातचीत और कूटनीति।’’
धनखड़ ने कहा, ‘‘दुनिया के बड़े बड़े लोग जब अशांति महसूस कर रहे थे, पथ से भटक गए, जब उन्हें अंधकार दिखाई दिया तो उनका रुख भारत की तरफ हुआ। इस तकनीकी युग में भी उन लोगों को मार्गदर्शन इसी देश में मिला।’’
भारत की आध्यात्मिक एवं प्रौद्योगिकी प्रगति पर प्रकाश डालते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा, ‘‘हमारी ऋषि परंपरा की वजह से ही आज भारत जल, थल, आकाश और अंतरिक्ष में बहुत बड़ी छलांग लगा रहा है।’’
इस अवसर पर, विश्वविद्यालय के कुलाधिपति जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य, प्रदेश के श्रम एवं रोजगार मंत्री अनिल राजभर, राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) नरेन्द्र कश्यप और अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।
भाषा सं राजेंद्र