उच्च न्यायालय ने स्कूल टीसी में शुल्क बकाया का उल्लेख किये जाने पर अप्रसन्नता जताई
देवेंद्र माधव
- 19 Jul 2024, 05:14 PM
- Updated: 05:14 PM
चेन्नई, 19 जुलाई (भाषा) मद्रास उच्च न्यायालय ने शुक्रवार को कहा कि किसी बच्चे का स्थानांतरण प्रमाण-पत्र (टीसी) स्कूलों के लिए लंबित शुल्क वसूलने का कोई जरिया नहीं है, बल्कि यह छात्र के नाम से जारी किया गया एक निजी दस्तावेज है तथा इसमें बकाया शुल्क के संबंध में कोई प्रविष्टि नहीं की जानी चाहिए।
उच्च न्यायालय ने तमिलनाडु सरकार को निर्देश दिया कि वह राज्यभर के सभी स्कूलों को परिपत्र/निर्देश/आदेश जारी करे, ताकि दाखिले के समय बच्चे से टीसी दिखाने पर जोर न दिया जाए तथा स्कूल प्रबंधन को दस्तावेज में शुल्क का भुगतान न करने या देरी से भुगतान करने जैसी जानकारी का उल्लेख करने से रोका जाये।
न्यायमूर्ति एस. एम. सुब्रमण्यम और न्यायमूर्ति सी. कुमारप्पन की खंडपीठ ने उपरोक्त निर्देश देते हुए कहा कि उल्लंघन की स्थिति में बच्चों को निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम (आरटीई अधिनियम) की धारा 17 और बच्चों के संरक्षण के लिए लागू प्रासंगिक कानूनों के तहत कार्रवाई शुरू की जायेगी।
पीठ ने राज्य सरकार को तमिलनाडु शिक्षा नियमों और मैट्रिक स्कूलों के लिए विनियमन संहिता पर फिर से विचार करने और इसके अनुसार तीन महीने की अवधि के भीतर आरटीई अधिनियम के प्रावधानों के अनुरूप सभी आवश्यक संशोधन करने का निर्देश दिया।
राज्य सरकार द्वारा दायर अपील को स्वीकार करते हुए, पीठ ने एकल न्यायाधीश के उस आदेश को खारिज कर दिया जिसमें अखिल भारतीय निजी स्कूल कानूनी संरक्षण सोसाइटी की याचिका को स्वीकार करते हुए पाया था कि छात्र द्वारा शुल्क के बकाया का संकेत मात्र से छात्र और अभिभावकों के खिलाफ कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ता है।
पीठ ने कहा कि शुल्क का भुगतान न करने या देरी से भुगतान करने पर बच्चों को परेशान करना क्रूरता के समान है और किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015 की धारा 75 के तहत अपराध है।
इसने कहा कि स्कूलों को कानून के अनुसार अभिभावकों से बकाया शुल्क, यदि कोई हो, वसूलने के लिए उचित कार्रवाई शुरू करने का पूरा अधिकार है लेकिन इस प्रक्रिया में शुल्क का भुगतान न करने पर बच्चे को परेशान करना या दंडित करना एक अपराध है और यह किशोर न्याय अधिनियम की धारा 75 के दायरे में आता है।
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