विधि महाविद्यालयों को कैसे विनियमित कर सकती है बीसीआई् : उच्चतम न्यायालय
भाषा
- 23 Sep 2026, 05:36 PM
- Updated: 05:36 PM
नयी दिल्ली, 23 सितंबर (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को कहा कि वह इस बात की पड़ताल करेगा कि क्या भारतीय विधिज्ञ परिषद (बीसीआई) के पास विधि महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों को विनियमित करने का अधिकार है। शीर्ष अदालत ने कहा कि नियामक के रूप में बीसीआई की वैधानिक भूमिका तभी शुरू होती है, जब लाइसेंस प्रदान किया जाता है।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने जानना चाहा कि बीसीआई को विधि शिक्षा को विनियमित करने के लिए विशेषज्ञ निकाय कैसे माना जा सकता है, जबकि शैक्षणिक मामलों के लिए कानून के विद्वान और शिक्षाविद अधिक उपयुक्त हैं।
प्रधान न्यायाधीश ने मौखिक टिप्पणी में कहा, "बीसीआई विधि महाविद्यालयों को कैसे विनियमित कर सकता है? यही असली सवाल है। इसकी वैधानिक भूमिका तभी शुरू होती है, जब किसी को लाइसेंस मिल जाता है। इसलिए सवाल यह है कि क्या विधि महाविद्यालयों को विनियमित किया जा सकता है? हम इस बात की जांच करना चाहेंगे कि क्या बीसीआई के पास विधि विश्वविद्यालयों/महाविद्यालयों को नियंत्रित और विनियमित करने की शक्ति है।''
उन्होंने सवाल किया, ''विधि शिक्षा को विनियमित करने के लिए बीसीआई विशेषज्ञ निकाय कैसे है? कानूनी शिक्षा के बारे में वे क्या जानते हैं? कानून के कई प्रतिष्ठित विद्वान और शिक्षाविद हैं...आप सामान्य दिशा-निर्देश तय कर सकते हैं...पाठ्यक्रम चार या पांच साल का होना चाहिए...लेकिन आप नियंत्रण नहीं कर सकते।''
शीर्ष अदालत 'बीसीआई-पर्ल फर्स्ट ट्रस्ट' के कामकाज और ट्रस्ट द्वारा विधि महाविद्यालयों की स्थापना को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी।
पीठ ने याचिकाओं पर नोटिस जारी करते हुए बीसीआई से दो सप्ताह में जवाब मांगा है।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता गिरीश मित्तल की ओर से पेश अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कहा कि बीसीआई ने 2016 में एक प्रस्ताव पारित करके पुराने ट्रस्ट को समाप्त कर दिया था और उसकी धनराशि एक नए ट्रस्ट को हस्तांतरित कर दी थी।
उन्होंने 2020 में बार काउंसिल ऑफ इंडिया ट्रस्ट फॉर प्रमोशन ऑफ एजुकेशन, लीगल एंड प्रोफेशनल रिफॉर्म्स एंड इम्प्रूवमेंट इन रिसर्च के गठन का उल्लेख किया।
भूषण ने आरोप लगाया कि ट्रस्ट के दस्तावेज में 11 प्रबंध न्यासियों को बीसीआई सदस्य के रूप में उनके कार्यकाल से अलग "मूल और स्थायी न्यासी" बना दिया गया।
उन्होंने कहा कि बाद में ट्रस्ट ने गोवा और आंध्र प्रदेश में एक-एक विधि महाविद्यालय स्थापित किया।
बीसीआई की ओर से पेश वकील ने कहा कि बार निकाय ने एक प्रस्ताव पारित किया है, जिसके तहत कोई भी आजीवन न्यासी नहीं होगा और न्यासियों का कार्यकाल बीसीआई में उनकी सदस्यता के साथ समाप्त हो जाएगा।
शीर्ष अदालत ने इससे पहले टिप्पणी की थी कि बीसीआई अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा का पद केवल "अस्थायी" (प्रोटेम) है, जब तक कि नवगठित वकील निकाय द्वारा पदाधिकारियों का चुनाव नहीं कर लिया जाता। अदालत ने निर्देश दिया था कि बीसीआई कोई भी नीतिगत निर्णय भारत के अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल से परामर्श के बाद ही ले।
इससे पहले अधिवक्ता योगमाया एम. जी. ने एक याचिका दायर करके मिश्रा के लंबे समय तक बीसीआई अध्यक्ष बने रहने की वैधता को चुनौती दी थी और उन्हें पद से हटाने का अनुरोध किया था।
याचिका में कहा गया था कि मिश्रा पहली बार 2012 तक बीसीआई अध्यक्ष चुने गए थे। इसमें कहा गया था हालांकि उन्होंने 2014 में कुछ समय के लिए पद छोड़ दिया था, लेकिन उसी साल नवंबर में फिर अध्यक्ष बन गए और तब से पद पर बने हुए हैं।
याचिका में दावा किया गया था कि बीसीआई के नियम 12(2) के तहत अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का कार्यकाल दो साल का होता है या सदस्यता समाप्त होने तक, जो भी पहले हो।
याचिका में शीर्ष अदालत के पूर्व न्यायाधीश या किसी उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक स्वतंत्र समिति गठित करने का अनुरोध किया गया है।
याचिका में 21 अप्रैल, 2025 की उस राजपत्र अधिसूचना को भी चुनौती दी गई है, जिसके तहत मिश्रा का कार्यकाल 2030 तक बढ़ाया गया है।
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