एनजीटी ने मध्य हिमालय में लटकते ग्लेशियर के खतरे को लेकर केंद्र को नोटिस जारी किया
रंजन
- 26 Apr 2026, 04:05 PM
- Updated: 04:05 PM
नयी दिल्ली, 26 अप्रैल (भाषा) राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने मध्य हिमालय की पर्वतीय ढलानों में लटके हुए ग्लेशियरों से उत्पन्न खतरे के संबंध में केंद्र और अन्य से जवाब मांगा है।
एनजीटी एक स्वत: संज्ञान मामले पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें उसने एक समाचार पत्र की रिपोर्ट पर गौर किया, जिसमें एक अध्ययन का हवाला देते हुए पर्यावरणीय चिंताओं को उजागर किया गया था।
एनजीटी के अध्यक्ष न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव और विशेषज्ञ सदस्य अफरोज अहमद की पीठ ने 24 अप्रैल को दिए एक आदेश में कहा, ''यह समाचार मध्य हिमालय में पर्वतीय ढलानों पर लटके हुए ग्लेशियर से उत्पन्न खतरे से संबंधित है, जहां पर्वतीय ढलानों पर लटके हुए अस्थिर ग्लेशियर विनाशकारी हिमस्खलन और निचले इलाकों में आपदाओं का कारण बन सकते हैं।''
पीठ ने रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि भारतीय विज्ञान संस्थान, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, भुवनेश्वर और रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन, चंडीगढ़ के चार शोधकर्ताओं ने उत्तराखंड के अलकनंदा बेसिन में ऐसे ग्लेशियरों का आकलन किया था, जो गंगा का एक प्रमुख उद्गम क्षेत्र है।
पीठ ने कहा, ''उनके निष्कर्षों से बढ़ते हुए लेकिन काफी हद तक अनदेखे खतरे के पैमाने और अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में तेजी से विकास के कारण मानव जोखिम में तीव्र वृद्धि का पता चला है।''
पीठ ने यह भी बताया कि उपग्रह छवियों और 'एलिवेशन मॉडल' का उपयोग करते हुए, शोधकर्ताओं ने हिमस्खलन के दायरे में आने वाली अधिकतम संभावित दूरी और उनके संभावित प्रभाव का आकलन किया था, और उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि सबसे खराब स्थिति में, प्रवाह उत्तराखंड में माना, बद्रीनाथ और हनुमान चट्टी सहित प्रमुख इलाकों तक पहुंच सकते हैं।
एनजीटी ने आधिकारिक तौर पर केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, स्वच्छ गंगा राष्ट्रीय मिशन, उत्तराखंड पर्यटन विकास बोर्ड और राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान को कार्यवाही में प्रतिवादी के रूप में शामिल किया है।
पीठ ने कहा, ''उपरोक्त प्रतिवादियों को अगली सुनवाई की तारीख (6 अगस्त) से कम से कम एक सप्ताह पहले अपना जवाब दाखिल करने के लिए नोटिस जारी किया जाए।''
भाषा शफीक रंजन
रंजन
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