महबूबा मुफ्ती के लिए पीडीपी के झंडे को फहराए रखना एक कठिन चुनौती है
देवेंद्र वैभव
- 08 Oct 2024, 07:07 PM
- Updated: 07:07 PM
(तस्वीर सहित)
श्रीनगर, आठ अक्टूबर (भाषा) जम्मू-कश्मीर में मिले जनादेश के अनुसार महबूबा मुफ्ती के लिए पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) का झंडा फहराए रखना एक कठिन चुनौती है।
पीडीपी ने 2014 में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के साथ गठबंधन करके पूर्ववर्ती राज्य में सरकार बनाई थी। इस विधानसभा चुनाव में पीडीपी ने कुल 84 सीट पर चुनाव लड़ा जिनमें से उसे मात्र तीन सीट पर जीत मिली थी।
वर्ष 2016 से 2018 तक मुख्यमंत्री रहीं महबूबा ने इस बार चुनाव नहीं लड़ा था। उनकी बेटी इल्तिजा मुफ्ती अपने पहले विधानसभा चुनाव में श्रीगुफवारा-बिजबेहरा सीट से हार गईं।
महबूबा को उम्मीद थी कि उनकी पार्टी पीडीपी क्षेत्रीय राजनीति में प्रासंगिक बने रहने के लिए पर्याप्त सीट जीतेगी।
पार्टी की उम्मीदें कम होने का संकेत इल्तिजा ने चुनाव से पहले ही दे दिया था जब उन्होंने कहा था कि ‘‘पीडीपी किंगमेकर होगी’’ क्योंकि चुनाव में त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति बनेगी।
विधि स्नातक 56 वर्षीय महबूबा ने 1996 में अपने पिता मुफ्ती मोहम्मद सईद के साथ कांग्रेस में शामिल होकर राज्य की मुख्यधारा की राजनीति में प्रवेश किया था। यह वह समय था जब आतंकवाद अपने चरम पर था।
वह पूर्ववर्ती जम्मू कश्मीर राज्य की पहली और अंतिम महिला मुख्यमंत्री थीं।
पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती (65) ने अपनी पार्टी को पुनर्जीवित करने की उम्मीद में उम्मीदवारों के लिए सक्रिय रूप से प्रचार किया, जिसे 2018 के बाद से सबसे अधिक नेताओं के दलबदल का सामना करना पड़ा है।
वर्ष 1996 में अपने पिता मुफ्ती मोहम्मद सईद के साथ राजनीति में आईं महबूबा ने पीडीपी को एक क्षेत्रीय राजनीतिक शक्ति बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, जिसने न केवल नेशनल कॉन्फ्रेंस का मुकाबला किया बल्कि क्षेत्र की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी को उसके गठन के चार साल के भीतर सत्ता से बाहर कर दिया।
वर्ष 2002 में 16 सीट जीतने वाली पीडीपी के विधायकों की संख्या 2008 में 21 और 2014 के विधानसभा चुनाव में 28 हो गई।
महबूबा चार बार विधायक रह चुकी हैं। उन्होंने 1996, 2002, 2008 के आम चुनाव और 2016 के उपचुनाव में जीत दर्ज की।
वह 2004 और 2014 के चुनाव में लोकसभा के लिए चुनी गई थीं।
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