न्यायालय ने चुनावी बॉण्ड योजना को रद्द करने के फैसले की समीक्षा के अनुरोध वाली याचिका खारिज की
प्रशांत माधव
- 05 Oct 2024, 06:42 PM
- Updated: 06:42 PM
नयी दिल्ली, पांच अक्टूबर (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने 15 फरवरी के उसके फैसले की समीक्षा का अनुरोध करने वाली याचिकाओं को खारिज कर दिया है, जिसमें मोदी सरकार की गुमनाम राजनीतिक फंडिंग की चुनावी बॉण्ड योजना को रद्द कर दिया गया था।
प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) डी.वाई. चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति संजीव खन्ना, न्यायमूर्ति बी.आर. गवई, न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने कहा कि रिकॉर्ड को देखने से कोई त्रुटि नजर नहीं आती।
शीर्ष अदालत ने समीक्षा याचिकाओं को खुली अदालत में सूचीबद्ध करने की प्रार्थना भी खारिज कर दी।
पीठ ने 25 सितंबर के अपने आदेश में कहा, “समीक्षा याचिकाओं का अवलोकन करने के पश्चात, अभिलेखों में कोई त्रुटि स्पष्ट नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय नियम 2013 के आदेश 47 नियम 1 के अंतर्गत समीक्षा का कोई मामला नहीं है। इसलिए, समीक्षा याचिकाओं को खारिज किया जाता है।”
अधिवक्ता मैथ्यूज जे नेदुम्परा और अन्य द्वारा दायर समीक्षा याचिकाओं में तर्क दिया गया कि योजना से संबंधित मामला विशेष रूप से विधायी और कार्यकारी नीति के क्षेत्राधिकार में आता है।
नेदुम्पारा ने अपनी याचिका में कहा, “अदालत इस बात पर संज्ञान लेने में विफल रही कि यह मानते हुए भी कि यह मुद्दा न्यायोचित है, याचिकाकर्ताओं ने इसमें अपने लिए कोई विशिष्ट कानूनी क्षति का दावा नहीं किया है, उनकी याचिका पर निर्णय इस प्रकार नहीं किया जा सकता था मानो यह उनके लिए विशिष्ट और अनन्य अधिकारों के प्रवर्तन के लिए एक निजी मुकदमा हो।”
उन्होंने कहा था कि न्यायालय यह संज्ञान लेने में विफल रहा कि जनता की राय में तीव्र विभाजन हो सकता है और इस देश के बहुसंख्यक लोग संभवतः इस योजना के समर्थन में हो सकते हैं, जिसे उनके निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा अस्तित्व में लाया गया है और उन्हें भी याचिकाकर्ताओं के समान ही अपनी बात कहने का अधिकार है।
प्रधान न्यायाधीश चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने कहा था कि 2018 की चुनावी बॉण्ड योजना संवैधानिक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सूचना के अधिकार का “उल्लंघन” है और इस योजना को रद्द कर दिया था।
चुनावी बॉण्ड योजना, जिसे सरकार ने दो जनवरी, 2018 को अधिसूचित किया था, को राजनीतिक फंडिंग में पारदर्शिता लाने के प्रयासों के तहत राजनीतिक दलों को दिए जाने वाले नकद दान के विकल्प के रूप में पेश किया गया था।
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