सावरकर मांस खाते थे, वह गौ वध के खिलाफ नहीं थे : कर्नाटक के मंत्री दिनेश गुंडू राव का दावा
संतोष वैभव
- 03 Oct 2024, 06:43 PM
- Updated: 06:43 PM
बेंगलुरु, तीन अक्टूबर (भाषा) कर्नाटक के स्वास्थ्य मंत्री दिनेश गुंडू राव ने दावा किया है कि हिंदुत्व विचारक विनायक दामोदर सावरकर मांस खाते थे और वह गौ वध के खिलाफ नहीं थे।
यहां एक कार्यक्रम में बुधवार को राव ने कहा, ‘‘सावरकर एक चितपावन ब्राह्मण थे और वह मांस खाते थे। वह मांसाहारी थे तथा गौ वध के खिलाफ नहीं थे। एक तरह से वह आधुनिक थे।’’
मंत्री ने दावा किया, ‘‘कुछ लोग कहते हैं कि वह बीफ भी खाते थे। एक ब्राह्मण के रूप में वह मांस खाते थे और मांसाहार का खुलेआम समर्थन करते थे। उनकी यही सोच थी।’’
राव ने कहा कि महात्मा गांधी एक शाकाहारी व्यक्ति थे और हिंदुत्व के प्रति उनकी दृढ़ आस्था थी, ‘‘लेकिन उनके कृत्य अलग थे। वह एक लोकतांत्रिक व्यक्ति थे।’’
उन्होंने कहा, ‘‘एक अन्य ध्रुव (पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली) जिन्ना थे। वह कट्टर इस्लामी व्यक्ति थे। वह शराब पीते थे और कहा जाता है कि वह सूअर का मांस भी खाते थे, लेकिन द्विराष्ट्र सिद्धांत और राजनीति के बाद वह प्रतिष्ठित मुस्लिम नेता बन गए। लेकिन जिन्ना रूढ़िवादी नहीं थे, बल्कि सावरकर रूढ़िवादी थे।’’
मंत्री ने बृहस्पतिवार को उस संदर्भ को स्पष्ट किया जिसके तहत उन्होंने ये टिप्पणियां कीं। मंत्री ने कहा कि एक पुस्तक के विमोचन के लिए आयोजित कार्यक्रम में महात्मा गांधी की हत्या पर चर्चा के दौरान उन्होंने ‘बहुत स्वस्थ चर्चा’ की थी।
उन्होंने ‘पीटीआई वीडियो’ से कहा, “यह मूल रूप से महात्मा गांधी और सावरकर के बीच विरोधाभास पर एक अवलोकन था। कैसे महात्मा गांधी एक धार्मिक व्यक्ति थे और कैसे सावरकर एक नास्तिक थे, कैसे महात्मा गांधी एक ऐसे व्यक्ति थे जो शाकाहारी थे और धर्म में बहुत आस्था रखते थे। सावरकर मांसाहारी थे और वह आधुनिकतावादी थे।’’
राव ने कहा कि उन्होंने गांधी और सावरकर के बीच अंतर इस बात पर प्रकाश डालने के लिए बताया कि ‘‘इस देश में कट्टरवाद का मुकाबला कैसे किया जाए, कैसे कट्टरवाद हिंसा को जन्म देता है और महात्मा गांधी के दर्शन का उपयोग करके इससे कैसे निपटा जा सकता है।’’
मंत्री ने कहा, ‘‘यदि आप (नाथूराम) गोडसे के दर्शन पर विचार करें तो उसे गांधी की हत्या करने का कोई पछतावा नहीं था क्योंकि वह सावरकर के दर्शन में विश्वास करता था। असल में वह सोचता था कि उसने देश के लिए एक बहुत महान काम किया था। कट्टरपंथ के साथ यही समस्या है। आप जो कुछ भी करते हैं, आप सोचते हैं कि यह उस उद्देश्य के लिए अच्छा है जिसके लिए आप लड़ रहे हैं।’’
भाषा संतोष