श्रीनगर की सह-अस्तित्व की भावना: ऐतिहासिक चुनौतियों के बीच एकता का प्रतीक
प्रशांत माधव
- 21 Sep 2024, 05:45 PM
- Updated: 05:45 PM
(अर्चना प्रसाद और बीनीश पारा)
श्रीनगर, 21 सितंबर (भाषा) सांप्रदायिक सद्भाव का एक अद्भुत उदाहरण श्रीनगर शहर के मध्य में मात्र 100-200 मीटर की दूरी पर एक कश्मीरी पंडित मंदिर और एक मस्जिद स्थित हैं, जो अक्सर संघर्ष और हिंसा से घिरे रहने वाले इस क्षेत्र में सह-अस्तित्व की चिरस्थायी भावना का प्रतीक है।
कश्मीर के अशांत इतिहास के बावजूद, बहुसंख्यक मुस्लिम समुदाय और अल्पसंख्यक कश्मीरी पंडितों के बीच संबंध मजबूत बने हुए हैं, जो “कश्मीरियत” के चरित्र को मूर्त रूप देते हैं - जो भाईचारे और पारस्परिक सम्मान को बढ़ावा देने वाली एक सांस्कृतिक अवधारणा है।
स्थानीय मुसलमानों ने हब्बा कदल क्षेत्र में पुरुषयार मंदिर के सहयोग में सक्रिय भूमिका निभाई है, जिससे एक-दूसरे की मान्यताओं के प्रति सम्मान का माहौल बना है।
पिछले 18 वर्षों से मंदिर की देखभाल कर रहे बबलू जी भट्ट ने मुस्लिम समुदाय के समर्थन के लिए आभार व्यक्त किया।
उन्होंने ‘पीटीआई वीडियो’ को बताया, “मैं एक मुस्लिम इलाके में रहता हूं और उन्होंने हमेशा मेरा साथ दिया है। मुझे कभी किसी से कोई नुकसान नहीं हुआ।”
जम्मू में 1990 में पलायन के बाद से कश्मीरी पंडितों के सामने आने वाली चुनौतियों पर विचार करते हुए, भट ने 2018 के बाद से क्षेत्र के माहौल में उल्लेखनीय सुधार का उल्लेख किया, जिसमें पथराव (की घटनाएं) और कर्फ्यू समाप्त हो गया।
उन्होंने कहा, “अब जीवन सामान्य हो रहा है।” उन्होंने नकारात्मक धारणाओं को खारिज करते हुए इस बात पर जोर दिया कि केवल कुछ ही लोगों ने कश्मीर में शांति भंग की है।
उसी क्षेत्र में स्थित एक अन्य हिंदू मंदिर का रखरखाव करने वाले सुशील कौल ने भी भट्ट की बात का समर्थन किया।
उन्होंने धर्म के बजाय मानवता पर आधारित भविष्य की कामना करते हुए कहा, “मैं कश्मीर और जम्मू के बीच यात्रा करता हूं, मेरा परिवार हमेशा यहां रहता है। मुसलमान और कश्मीरी पंडित शांतिपूर्ण ढंग से सह-अस्तित्व में रहे हैं।”
पास में ही एक अन्य हिंदू मंदिर की देखरेख करने वाले राकेश टिक्कू ने घाटी की सबसे पुरानी मस्जिद की निकटता पर प्रकाश डाला, जो केवल 50 मीटर की दूरी पर है। उन्होंने सह-अस्तित्व के संदेश को पुष्ट करते हुए कहा, “हमें कभी किसी परेशानी का सामना नहीं करना पड़ा।”
इस क्षेत्र में 25 सितंबर और एक अक्टूबर को होने वाले विधानसभा चुनावों के अंतिम दो चरणों के लिए तैयारी हो रही है, ऐसे में निवासियों को अपने साझा मूल्यों की पुनः पुष्टि की उम्मीद है।
कौल ने सामुदायिक सहयोग और एकता के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा, “हम एक ऐसा कश्मीर देखना चाहते हैं जहां लोग शांति और सद्भाव के साथ मिलजुल कर रहें।”
भाषा
प्रशांत