उत्तराखंड : रुद्रप्रयाग को कर्मभूमि बनाने वाले स्वतंत्रता सेनानी शाह के संघर्षों को नमन
सं दीप्ति जितेंद्र
- 14 Aug 2024, 06:46 PM
- Updated: 06:46 PM
गोपेश्वर, 14 अगस्त (भाषा) उत्तराखंड के चमोली जिले में जन्मे और रुद्रप्रयाग को अपनी कर्मभूमि बनाने वाले शेर सिंह शाह देश के उन भूले बिसरे योद्धाओं में शामिल हैं, जिनके संघर्षों को आजादी के उत्सव में नमन किया जा रहा है।
केंद्र सरकार के संस्कृति मंत्रालय की वेबसाइट की सूची में दिवंगत शाह को स्थान मिलने से उत्साहित उनके पौत्र कुंवर सिंह ने बताया कि हमारे दादा ने पहले आजादी के आंदोलन में हिस्सा लिया और उसके हासिल होने के बाद समाजसेवा को अपने जीवन का ध्येय बना लिया।
उन्होंने ‘पीटीआई भाषा’ से कहा कि निर्धन मेधावी विद्यार्थियों की सहायता के लिए उनके नाम पर गठित ट्रस्ट आज भी मौजूद है।
शाह का जन्म 16 सितम्बर 1912 को चमोली जिले के दशोली विकास खंड के सोनला गांव में हुआ था।
जोशीमठ में प्रारंभिक शिक्षा पूरी करने के बाद वह रुद्रप्रयाग के गुप्तकाशी में नाला ग्राम में बस गए और अपना पैतृक स्वर्णकारी का व्यवसाय प्रारम्भ किया।
केदारनाथ में अपने दादा के पैतृक व्यवसाय को आगे बढ़ा रहे सिंह ने बताया कि इसके बाद शाह की कर्मभूमि गुप्तकाशी और केदारघाटी रही।
गुप्तकाशी के केदारनाथ का प्रमुख पड़ाव होने से शाह ने अपने पैतृक व्यवसाय के साथ ही धार्मिक साहित्य, फोटो, गाइड बुक और यात्रा मार्ग संबंधी मानचित्र भी तीर्थ यात्रियों को सुलभ कराए।
सिंह ने बताया कि दिवंगत शाह की बचपन से ही सामाजिक कार्यों में रुचि थी और देशभर के तीर्थयात्रियों के आवागमन तथा राष्ट्रीय स्तर पर गांधी जी के आंदोलन के कारण उनकी रुचि आजादी के आंदोलन की ओर भी बढ़ने लगी।
उन्होंने कहा कि हांलांकि, दिवंगत शाह 1935 में ही कांग्रेस की सदस्यता ले चुके थे लेकिन 1940 में क्षेत्र के जननेता अनुसूया प्रसाद बहुगुणा से प्रेरित हो कर उन्होंने सक्रिय राजनीति में भाग लेना प्रारंभ कर दिया।
बहुगुणा के नेतृत्व में 1941 में शाह ने अपने साथी मदन लाल शुक्ल के साथ केदारघाटी में व्यक्तिगत सत्याग्रह में भाग लिया और 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन घाटी में गूंजने लगा।
बाद में, बहुगुणा के अस्वस्थ होने के कारण शाह ने आंदोलन की कमान अपने हाथों में संभाली, जिसके बाद राजद्रोह के आरोप में उन्हें ढाई वर्ष की सजा सुना कर अदालत ने जेल भेज दिया।
वर्ष 1945 में जेल से रिहा होने के बाद शाह ने चमोली तहसील में कांग्रेस के संगठन को खड़ा करने में सक्रिय योगदान दिया।
सिंह ने बताया कि स्वाधीनता प्राप्ति के बाद उन्होंने समाज सेवा को अपना ध्येय बना लिया। शाह को गढ़वाल सहकारी सभा का मैनेजर नियुक्त किया गया और 1948 से 1962 तक वह जिला बोर्ड गढ़वाल के सदस्य रहे। उन्होंने गढ़वाल में सहकारिता आन्दोलन को बढ़ावा देने के अलावा, गुप्तकाशी के निकट विद्यापीठ की स्थापना की और फिर इसका प्रबंधक बन इस संस्थान को उत्तर प्रदेश में अग्रणी बनाने में अथक प्रयास किए।
सिंह ने बताया कि उनके दादा का एक अन्य उल्लेखनीय कार्य 1978 में निर्धन मेधावी बच्चों के लिए धर्मादा ट्रस्ट की स्थापना करना था। अपनी दानशीलता के गुण के चलते उन्होंने अपनी अर्जित संपत्ति को समाज कल्याण में लगा दिया।
वर्ष 991 में शाह का निधन नाला गांव में हुआ।
सिंह ने बताया कि उनका पूरा बचपन दादा के साथ बीता और इस दौरान उन्होंने देखा कि जरुरतमंदों को बेहतर सुविधा मिले, इसके लिए वह हमेशा चिंतित रहते थे।
सिंह ने इस बात पर दुख जताया कि उनके दादा द्वारा स्थापित ट्रस्ट की वर्षों से बैठक नहीं हो पायी है, जिसके चलते निर्धन मेधावी बच्चों को सहायता नहीं दी जा पा रही है।
इस संबंध में उन्होंने कहा कि चमोली के जिलाधिकारी ट्रस्ट के पदेन अध्यक्ष हैं लेकिन वह उसे समय नहीं दे पा रहे हैं।
भाषा सं दीप्ति