बांझपन से लड़ने के लिए सामूहिक सामाजिक प्रयास की आवश्यकता: डॉ. अजय मुर्डिया
अमित संतोष
- 11 Aug 2024, 08:12 PM
- Updated: 08:12 PM
नयी दिल्ली, 11 अगस्त (भाषा) भारत में बांझपन जन स्वास्थ्य संबंधी बड़ी चुनौतियों में से एक बनता जा रहा है। यह बात प्रजनन विशेषज्ञ डॉ. अजय मुर्डिया ने कही है।
डॉ. अजय मुर्डिया ने लोगों को शिक्षित करने और बांझपन से जुड़े कलंक को मिटाने की आवश्यकता पर बल दिया, ताकि इससे पीड़ित आसानी से मदद ले सकें।
भारत की सबसे बड़ी प्रजनन श्रृंखलाओं में से एक, इंदिरा आईवीएफ के संस्थापक एवं अध्यक्ष डॉ. मुर्डिया ने कहा कि बांझपन से लड़ने के लिए सामूहिक सामाजिक प्रयास की आवश्यकता है।
डॉ. मुर्डिया ने ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया कि हालांकि बांझपन को एक गंभीर चिकित्सा स्थिति के रूप में पहचानने के लिए जागरूकता अभियान और शैक्षिक पहल महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन वास्तविक प्रगति व्यापक सामुदायिक भागीदारी पर निर्भर करती है।
उन्होंने कहा, "इस प्रयास की कुंजी सार्वजनिक समझ में सुधार, खुले संवाद को प्रोत्साहित करना और गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा देखभाल तक पहुंच सुनिश्चित करना है। व्यक्तियों, स्वास्थ्य पेशेवरों और संगठनों के बीच सहयोग को बढ़ावा देकर, समाज बांझपन से जुड़े कलंक को काफी हद तक कम कर सकता है और प्रभावित परिवारों को आवश्यक सहायता प्रदान कर सकता है।’’
उन्होंने कहा, "यह एकीकृत दृष्टिकोण प्रजनन संबंधी चुनौतियों का सामना करने वाले लोगों के लिए एक सहायक वातावरण बनाने और अंततः बांझपन से मुक्ति पाने में महत्वपूर्ण है।"
डॉ. मुर्डिया ने कहा कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, भारत में बांझपन की दर एक व्यापक वैश्विक प्रवृत्ति को दर्शाती है, दुनिया भर में लगभग 17.5 प्रतिशत वयस्क आबादी बांझपन से प्रभावित है।
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण डेटा (2019-21) से पता चलता है कि भारत के शहरी क्षेत्रों में प्रजनन दर 1.6 और ग्रामीण भागों में 2.1 है। 2050 तक, भारत की कुल प्रजनन दर (टीएफआर) अपरिवर्तनीय रूप से घटकर 1.29 हो जाने का अनुमान है।
‘नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ’ द्वारा किए गए एक अध्ययन से पता चला है कि लगभग 20 प्रतिशत बांझपन के मामलों के लिए केवल पुरुष ही जिम्मेदार हैं तथा अन्य 30 से 40 प्रतिशत मामलों में योगदान देने वाली भूमिका निभाता है।
डॉ. मुर्डिया ने बताया, ‘‘कुछ अनुमानों के अनुसार, गर्भधारण के लिए सक्रिय रूप से प्रयास कर रहे लगभग 2.75 करोड़ विवाहित जोड़े बांझपन से पीड़ित हैं। हालांकि हर साल केवल लगभग 2,75,000 आईवीएफ चक्र ही पूरे किए जाते हैं।’’
भाषा अमित संतोष