ग्रामीण भारत में समुदाय-नेतृत्व वाली पोषण पहल से आहार विविधता को बढ़ावा मिल सकता है: अध्ययन
रंजन नेत्रपाल
- 11 Aug 2024, 05:00 PM
- Updated: 05:00 PM
नयी दिल्ली, 11 अगस्त (भाषा) राजस्थान के पिंडवाड़ा गांव में स्थानीय महिलाओं के नेतृत्व में जमीनी स्तर पर की गई पहल ने पोषण के प्रति समुदाय के दृष्टिकोण को बदल दिया है।
स्वयं सहायता समूह की सदस्य महिलाओं ने अपने परिवारों के लिए विविध और पौष्टिक भोजन की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए किचन गार्डन की खेती शुरू की है।
अब इन बगीचों में विभिन्न प्रकार के फल और सब्जियां मिलते हैं, जो संतुलित आहार में योगदान देते हैं। इस व्यवस्था ने बाजार से खरीदे जाने वाले खाद्य पदार्थों पर समुदाय की (महिलाओं की) निर्भरता को कम किया है, जो अकसर कम पौष्टिक होते हैं।
इस पहल ने न केवल स्वास्थ्य में सुधार किया है, बल्कि महिलाओं को अपने परिवार के पोषण पर नियंत्रण देकर उन्हें सशक्त भी बनाया है।
इसी तरह, छत्तीसगढ़ के आदिवासी क्षेत्रों में, स्थानीय समुदाय के नेताओं के सामूहिक प्रयास ने पारंपरिक कृषि पद्धतियों को पुनर्जीवित किया है।
समुदाय ने मोटे अनाजों (श्रीअन्न) एवं दालों जैसी देशी फसलों की खेती फिर से शुरू की है, जो बदलती जलवायु के प्रति अधिक अनुकूल है और इनकी खेती के लिए कम संसाधनों की आवश्यकता होती है। ये फसलें आवश्यक पोषक तत्वों से भरपूर हैं और ऐतिहासिक रूप से स्थानीय आहार का हिस्सा रही हैं।
समुदाय के प्रयासों ने न केवल इन पारंपरिक खाद्य पदार्थों को संरक्षित किया है, बल्कि आबादी, विशेष रूप से बच्चों और महिलाओं की पोषण स्थिति में सुधार भी किया है।
समुदाय द्वारा की गई ये पहल ग्रामीण भारत में आहार विविधता पर हाल ही में किए गए एक अध्ययन में देखे गए व्यापक पैटर्न का हिस्सा हैं।
यूनिसेफ के सहयोग से गैर सरकारी संगठन विटामिन एंजेल्स इंडिया द्वारा कई राज्यों में किए गए गुणात्मक अध्ययन में पाया गया कि मजबूत स्थानीय नेतृत्व और जमीनी स्तर की पहल वाले समुदायों ने आहार विविधता एवं पोषण परिणामों में महत्वपूर्ण सुधार किया है ।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 0-5 वर्ष की आयु के लगभग 17 प्रतिशत बच्चे कम वजन के हैं, जबकि 36 प्रतिशत बच्चों का कद छोटा है, और छह प्रतिशत बच्चे कमजोर (अपनी ऊंचाई के हिसाब से बहुत पतले, जो गंभीर कुपोषण का संकेत है) हैं।
इन आंकड़ों के अनुसार, 0-5 वर्ष की आयु के बच्चों में बौनापन, कमजोरी और कम वजन कुपोषण के प्रमुख संकेतक हैं।
अध्ययन के मुख्य निष्कर्षों में से एक यह है कि पोषण संबंधी गतिविधियों में सक्रिय स्थानीय भागीदारी वाले समुदायों में विविध और पौष्टिक भोजन का सेवन अधिक होता है।
भाषा रंजन