न्यायालय ने सोनम रघुवंशी की जमानत रद्द की, आत्मसमर्पण के लिए तीन सप्ताह दिए
नरेश
- 23 Jul 2026, 05:22 PM
- Updated: 05:22 PM
नयी दिल्ली, 23 जुलाई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने 2025 में हनीमून के दौरान अपने पति राजा रघुवंशी की हत्या करने की आरोपी सोनम रघुवंशी को दी गई जमानत बृहस्पतिवार को रद्द कर दी और तीन सप्ताह के भीतर पुलिस के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया।
न्यायमूर्ति एम. एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति पी. बी. वराले की पीठ ने सोनम को जमानत दिए जाने के खिलाफ मेघालय सरकार की याचिका स्वीकार कर ली।
पीठ ने कहा, ''प्रतिवादी (सोनम) ने अपनी गिरफ्तारी के कारणों पर संतुष्टि जताई। दस्तावेज वास्तव में उसे दिए गए थे। इसलिए, हम गिरफ्तारी की वैधता के मुद्दे पर नहीं जाना चाहते। इतना कहना काफी है कि दोनों अदालतों ने इस अदालत के फैसले के आधार पर जमानत देकर गलती की है।''
उच्चतम न्यायालय ने कहा कि यदि मुकदमे की सुनवाई आगे नहीं बढ़ती और छह महीने के भीतर पूरी नहीं होती है तो सोनम नयी जमानत याचिका दायर कर सकती है।
मध्य प्रदेश के इंदौर की निवासी सोनम को उसके कारोबारी पति राजा रघुवंशी की हत्या के सिलसिले में पिछले वर्ष जून में गिरफ्तार किया गया था।
यह दंपति पिछले वर्ष 23 मई को मेघालय के सोहरा क्षेत्र में छुट्टियां मनाने के दौरान लापता हो गया था। बाद में दो जून 2025 को राजा का शव एक गहरी खाई से बरामद किया गया था।
पुलिस ने आरोप लगाया है कि सोनम ने भाड़े के हमलावरों के साथ मिलकर आर्थिक लाभ के लिए अपने पति की हत्या की साजिश रची थी।
सोनम की तरफ से पेश हुए वकील ने जमानत का बचाव करते हुए कहा कि उन्हें गिरफ्तारी का आधार नहीं दिया गया था।
मेघालय सरकार की तरफ से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि सोनम को न सिर्फ गिरफ्तारी का आधार दिया गया था, बल्कि संबंधित दस्तावेज भी दिए गए थे।
मेहता ने कहा कि सोनम के खिलाफ आरोप काफी गंभीर हैं और मेघालय उच्च न्यायालय ने उसकी जमानत बरकरार रखकर गलती की है।
उच्च न्यायालय ने सोनम की जमानत इस आधार पर बरकरार रखी थी कि पुलिस गिरफ्तारी का सही लिखित आधार नहीं दे पाई थी।
इस बीच, उच्चतम न्यायालय ने यह भी कहा कि सोनम रघुवंशी जैसे मामले बदलते समाज में होना तय है।
पीठ ने कहा कि हो सकता है कि आज की पीढ़ी ''हमसे ज्यादा जानकार'' हो, लेकिन दबाव का सामना करने के मामले में वे ज्यादा कमजोर हैं।
न्यायमूर्ति सुंदरेश ने कहा, ''बदलते समाज में ऐसी घटनाएं होना तय है... आज की पीढ़ी बेचैन है। वे समस्याओं का तुरंत समाधान चाहते हैं।''
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि सोशल मीडिया की वजह से आज की पीढ़ी के पास जानकारी तो ज्यादा हो सकती है, लेकिन उनके पास असल ज्ञान नहीं है।
न्यायमूर्ति वराले ने कहा कि आजकल व्हाट्सएप पर जो कुछ भी साझा किया जाता है, उसे ही ज्ञान मान लिया जाता है।
मेहता ने कहा, ''ऐसे मजेदार वीडियो (रील) भी हैं जिनमें पति सुरक्षा गार्ड के साथ हनीमून पर जाता है। पति-पत्नी बनने वाले स्त्री-पुरुष के बीच का वह भरोसा या रिश्ता कमजोर पड़ रहा है। पहले संयुक्त परिवार व्यवस्था रिश्तों का ध्यान रखती थी।''
पीठ ने कहा, ''अगर आप संयुक्त परिवार के सदस्य हैं, तो आप निराशा को झेलना और तालमेल बिठाना सीखेंगे। एकल परिवार में, आप छोटी-छोटी बातों पर रोने लगते हैं। अगर आपको मनचाही चीज नहीं मिलती, तो आप परेशान हो जाते हैं।''
न्यायमूर्ति मेहता ने कहा कि एक रिपोर्ट के अनुसार, एकल परिवार व्यवस्था के कारण अवसाद के मामले बढ़ रहे हैं।
भाषा शफीक नरेश
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