कानूनी शर्तें पूरी होने पर हत्या के आरोपी किशोर पर वयस्क की तरह चल सकता है मुकदमा : न्यायालय
दिलीप
- 21 Jul 2026, 09:38 PM
- Updated: 09:38 PM
नयी दिल्ली, 21 जुलाई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को व्यवस्था दी कि हत्या के आरोपी किशोर पर पर वयस्क की तरह मुकदमा चलाया जा सकता है बशर्ते किशोर न्याय अधिनियम के तहत उल्लेखित 'जघन्य अपराध' जैसी कानूनी शर्तें पूरी होती हों।
न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने एक नाबालिग की अपील खारिज करते हुए ये टिप्पणियां कीं। यह अपील पटना उच्च न्यायालय के उस फैसले के खिलाफ थी, जिसमें एक लड़के की हत्या के मामले में अपीलकर्ता के खिलाफ वयस्क की तरह मुकदमा चलाने की अनुमति दी गई थी।
नाबालिगों पर वयस्कों की तरह मुकदमा चलाने के कानूनी ढांचे को स्पष्ट करने के उद्देश्य से दिए गए इस फैसले में कहा गया है कि हत्या (पूर्ववर्ती भारतीय दंड संहिता की धारा 302) को ' किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और सुरक्षा) अधिनियम- 2015' के तहत 'जघन्य अपराध' माना जाना चाहिए।
न्यायालय का यह फैसला बिहार में एक लड़के की गला काटकर हत्या करने के 16 वर्षीय आरोपी की अपील पर आया है।
पटना उच्च न्यायालय ने फैसला दिया था कि अपीलकर्ता पर एक बालिग के तौर पर मुकदमा चलाने की ज़रूरत है, और तदनुसार किशोर न्याय बोर्ड को निर्देश दिया कि वह इस मामले को नियमित अदालत में स्थानांतरित कर दे।
कानूनी लड़ाई का मुख्य आधार सजा तय करने की परिभाषाओं से जुड़ी एक तकनीकी पहलू पर थी। किशोर न्याय अधिनियम के तहत 'जघन्य अपराध' की श्रेणी में उन अपराधों को रखा जाता है, जिनमें कम से कम सात साल या उससे अधिक सजा का प्रावधान होता है।
किशोर आरोपी के वकील ने दलील दी थी कि चूंकि आईपीसी की धारा 302 में ''मृत्युदंड या उम्रकैद' की सजा का प्रावधान है, लेकिन इसमें साफ तौर पर ''कम से कम'' शब्द का इस्तेमाल नहीं किया गया है, इसलिए हत्या को 'जघन्य अपराध' के बजाय 'गंभीर अपराध' की श्रेणी में रखा जाना चाहिए।
न्यायमूर्ति पारदीवाला ने पीठ की ओर से लिखे फैसले में कहा कि हत्या के मामले में उम्रकैद ही कम-से-कम सजा है, क्योंकि धारा 302 के तहत दोषी ठहराए जाने पर अदालतें उम्रकैद से कम सजा नहीं दे सकतीं।
न्यायालय ने फैसले में कहा, ''आईपीसी की धारा 302 के तहत आने वाले अपराध में 'मृत्युदंड या उम्रकैद' की सज़ा का प्रावधान है, कम-से-कम सजा उम्रकैद होती है। इसलिए इसे 'जघन्य अपराध' की श्रेणी में रखा जाएगा।''
किशोर न्याय बोर्ड ने शुरू में यह तय किया था कि आरोपी किशोर का मुकदमा बोर्ड खुद चलाएगा, लेकिन अपीलीय सत्र न्यायालय ने उस फैसले को पलट दिया।
आरोपी किशोर पर एक वयस्क की तरह मुकदमा चलाने के फैसले को बाद में उच्च न्यायालय ने बरकरार रखा। उच्च न्यायालय के फैसले को किशोर ने उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी।
भाष धीरज दिलीप
दिलीप
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