वांगचुक की जान बचाना प्राथमिकता : अदालत ने सफदरजंग अस्पताल से मांगी मेडिकल रिपोर्ट
दिलीप
- 20 Jul 2026, 10:05 PM
- Updated: 10:05 PM
नयी दिल्ली, 20 जुलाई (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने सोमवार को सफदरजंग अस्पताल से सोनम वांगचुक की जांच रिपोर्ट और स्वास्थ्य बुलेटिन जमा करने को कहा। साथ ही, अदालत ने कहा कि वह मंगलवार को भूख हड़ताल कर रहे जलवायु कार्यकर्ता की पत्नी गीतांजलि जे. आंग्मो की उस याचिका पर फैसला करेगी, जिसमें उन्हें किसी निजी अस्पताल में स्थानांतरित करने का अनुरोध किया गया है।
अदालत ने कहा कि उसका मकसद वांगचुक की जान "बचाना" है, और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से कार्यकर्ता की चिकित्सा रिपोर्ट का पूरा विवरण रिकॉर्ड पर लाने को कहा।
पीठ सफदरजंग अस्पताल में वांगचुक के हो रहे इलाज में दखल देने से इनकार करने संबंधी एकल न्यायाधीश के आदेश को चुनौती देने वाली आंग्मो की अपील पर सुनवाई कर रही थी। अदालत ने रविवार को केंद्र सरकार के अस्पताल में उनके चल रहे इलाज में दखल देने से इनकार कर दिया।
मुख्य न्यायाधीश डी.के. उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की पीठ ने कहा, "हम निर्देश देते हैं कि अपीलकर्ता के पति की सभी पैथोलॉजिकल रिपोर्ट - जो सफदरजंग, एम्स और एक निजी लैब में नमूने की जांच पर आधारित हैं - उन्हें प्रतिवादी नंबर 4 (सफदरजंग अस्पताल) के निदेशक द्वारा शपथ-पत्र पर दाखिल किया जाए।"
इसमें आगे कहा गया है कि प्रतिवादी संख्या 4 को निर्देश दिया जाता है कि हलफनामा दाखिल करते समय, वह समय-समय पर जारी किए गए सभी मेडिकल बुलेटिन भी रिकॉर्ड पर लाए।
पीठ ने कहा, "रिपोर्ट में आज के नमूनों का विश्लेषण शामिल होना चाहिए।"
पीठ ने एम्स के प्रभारी निदेशक और वांगचुक का इलाज कर रहे एम्स के आपातकालीन विभाग में तैनात चिकित्सक को सुनवाई में मौजूद रहने के लिए कहा, और उन डॉक्टर को भी मौजूद रहने का निर्देश दिया जो पहले उनका इलाज कर रहे थे।
सफदरजंग अस्पताल ने रविवार को कहा था कि वांगचुक को वीएमएमसी, सफदरजंग अस्पताल और एम्स, नयी दिल्ली के डॉक्टरों की टीम ने जरूरी चिकित्सा देखभाल दी थी।
अदालत ने कहा, "कोर्ट की प्राथमिकता सबसे पहले उनकी जान बचाना है। हमें किसी और चीज से मतलब नहीं है। इसलिए, आपने जिन भी नमूनों का विश्लेषण किया है... कृपया उनकी रिपोर्ट तैयार करें और हलफ़नामे के साथ जमा करें।"
इसमें आंग्मो से वांगचुक के रक्त विश्लेषण की रिपोर्ट भी जमा करने को कहा गया, क्योंकि ऐसा बताया गया था कि ये जांच उनके ही कहने पर एक निजी लैब में की गयी थी।
आंग्मो की तरफ से बहस करते हुए वरिष्ठ वकील अखिल सिब्बल ने कहा कि वांगचुक को शनिवार को जंतर-मंतर से उठाया गया और बिना किसी सलाह-मशविरे या मेडिकल इमरजेंसी के सफदरजंग ले जाया गया। यह कार्रवाई कथित तौर पर पीठ के 16 जुलाई के उस आदेश के तहत की गई, जिसमें अधिकारियों से उनकी सेहत पर नजर रखने और जरूरत पड़ने पर चिकित्सा सहायदा देने को कहा गया था।
अपनी पसंद के अस्पताल में इलाज या देखरेख पाने और अपने शरीर पर अपना अधिकार होने की बात कहते हुए सिब्बल ने कहा कि घटनाओं के इस क्रम से "भरोसा टूटा" है, और वांगचुक को - जिन्हें किसी हिरासत में नहीं रखा गया था - सफदरजंग अस्पताल से छुट्टी मिलनी चाहिए।
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि अभी भी वांगचुक आईसीयू में नहीं हैं, पूरी तरह होश में और स्पष्ट रूप से बात करने की स्थिति में हैं, और उन्हें सफदरजंग अस्पताल में रहने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए।
अदालत को यह भी बताया गया कि वांगचुक ने अस्पताल को एक पत्र लिखकर 'कॉकरोच जनता पार्टी' (कॉजपा) के नेतृत्व में संसद तक होने वाले मार्च में शामिल होने की अनुमति मांगी थी, जिसे मंज़ूरी नहीं दी गई।
सिब्बल ने आगे कहा कि लोकतंत्र में भूख हड़ताल विरोध का एक मान्य तरीका है।
पीठ ने कहा कि हालांकि वह इस बात से सहमत है कि वांगचुक की रिपोर्ट उनके परिवार के साथ साझा की जानी चाहिए, लेकिन वह उन डॉक्टरों की राय पर कोई टिप्पणी नहीं कर सकती जो विशेषज्ञ हैं।
उसने यह भी सवाल उठाया कि क्या डॉक्टरों को किसी भी तरह का इलाज शुरू करने से पहले मरीज के आईसीयू में भर्ती होने का इंतज़ार करना चाहिए।
सरकारी अस्पताल में वांगचुक के साथ किए गए बर्ताव का बचाव करते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि यह किसी "आम व्यक्ति" का मामला नहीं था जो "घर पर बैठा" हो, और किसी भी "बाद की अप्रत्याशित घटना" के संभावित नतीजों को देखते हुए, यह राज्य की ज़िम्मेदारी थी कि वह यह सुनिश्चित करे कि उनकी सेहत और न बिगड़े और इससे कानून-व्यवस्था का संकट पैदा न हो।
इससे पहले, आंग्मो के वरिष्ठ वकील द्वारा मामले का ज़िक्र किए जाने के बाद पीठ ने इसे तत्काल आधार पर सुनने पर सहमति जताई।
अपनी अपील में आंग्मो ने तर्क दिया कि एकल न्यायाधीश का रविवार का आदेश बिना किसी गिरफ्तारी के वांगचुक को सफदरजंग अस्पताल में गैर-कानूनी रूप से सीमित करता है और असल में यह निर्देश देता है कि न तो कार्यकर्ता और न ही उनकी पत्नी को उनके इलाज के बारे में फैसला लेने का निर्णायक अधिकार है।
दिल्ली उच्च न्यायालय ने रविवार को वांगचुक के सफदरजंग अस्पताल में जारी इलाज के मामले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया था।
रविवार को विशेष सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति मिनी पुष्करणा ने कहा कि सफदरजंग अस्पताल के चिकित्सक वांगचुक के स्वास्थ्य की लगातार निगरानी कर रहे हैं और ऐसा नहीं कहा जा सकता कि उनके साथ किसी प्रकार की जबरदस्ती की जा रही है।
एकल न्यायाधीश की राय थी कि इस चरण पर कार्यकर्ता को तुरंत दूसरी जगह भेजने के लिए किसी अंतरिम आदेश की जरूरत नहीं है।
यह टिप्पणी आंग्मो की उस याचिका पर आई, जिसमें उन्हें किसी निजी अस्पताल में स्थानांतरित करने की इजाजत मांगी गई थी।
सोनम वांगचुक केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी (कॉजपा) के नेतृत्व में जारी प्रदर्शन के समर्थन में 28 जून से अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर हैं।
भाषा प्रशांत दिलीप
दिलीप
2007 2205 दिल्ली