बिहार ने आपातकाल के दौरान 'दूसरे स्वतंत्रता आंदोलन' का नेतृत्व किया : उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन
माधव
- 11 Jul 2026, 05:35 PM
- Updated: 05:35 PM
पटना, 11 जुलाई (भाषा) उपराष्ट्रपति सी पी राधाकृष्णन ने शनिवार को कहा कि बिहार ने न केवल देश के स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, बल्कि आपातकाल के दौरान ''दूसरे स्वतंत्रता आंदोलन'' का भी नेतृत्व किया।
राधाकृष्णन ने गयाजी जिले में बिहार के विधायकों के लिए आयोजित दो दिवसीय प्रबोधन कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र में अपने संबोधन में जनप्रतिनिधियों से जनकल्याण के लिए काम करने की अपील की।
उपराष्ट्रपति ने कहा, ''बिहार ने न केवल देश के स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, बल्कि आपातकाल के दौरान भी आगे बढ़कर दूसरे स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व किया।''
उपराष्ट्रपति ने आपातकाल के दौरान प्रसिद्ध जेपी आंदोलन में कॉलेज छात्र के रूप में अपनी भागीदारी को याद किया। उन्होंने कहा कि इस आंदोलन ने उनकी राजनीतिक यात्रा को गहराई से प्रभावित किया।
भारत में 25 जून, 1975 से 21 मार्च, 1977 तक संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत आपातकाल लागू रहा था।
उपराष्ट्रपति ने कहा कि बिहार ने बाबू राजेंद्र प्रसाद से लेकर जयप्रकाश नारायण और कर्पूरी ठाकुर तक कई महान विभूतियां दी हैं, जिन्होंने गरीबों की बेहतरी के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया।
उन्होंने कहा, ''चुनाव भले ही राजनीतिक दलों की विचारधारा के आधार पर लड़े जाते हैं, लेकिन चुनाव समाप्त होने के बाद लोगों और विकास के लिए मिलकर काम करना हमारी जिम्मेदारी है। ''
उन्होंने कहा, ''सदन में विचार अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन संविधान हम सभी का साझा मार्गदर्शक होना चाहिए।''
राधाकृष्णन ने राजनीतिक नेताओं के बीच सौहार्द और आपसी सहिष्णुता को सामने रखते हुए कई उदाहरण दिए।
उन्होंने कहा, ''मुझे याद है, लोकसभा में जब लालू जी ने अटल जी (पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी) पर तीखे व्यंग्य किए थे, तो अटल जी ही खूब हंसे थे। या यूं ही कह लीजिए, (राष्ट्रीय जनता दल नेता एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री) रघुवंश प्रसाद जी निचले सदन में मेरे प्रबल प्रतिद्वंदी थे, लेकिन सदन से बाहर निकलने के बाद हम एक ही कार में जाते थे।''
उन्होंने कहा, ''बेशक, एक विधायक के पास अधिकार होते हैं, लेकिन उनका इस्तेमाल सदन की कार्यवाही में इस हद तक बाधा डालने के लिए नहीं किया जाना चाहिए कि पीठासीन अधिकारी को अपने अधिकारों का इस्तेमाल करना पड़े। लोकतंत्र में, हम अलग-अलग राय रख सकते हैं। लेकिन हम सभी को एक बात पर सहमत होना चाहिए: लोगों और संविधान के प्रति हमारी प्रतिबद्धता है। सदन में विचार अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन संविधान हमारा साझा मार्गदर्शक बना रहना चाहिए।''
उपराष्ट्रपति ने कहा कि चर्चा, बहस और कभी-कभी होने वाले व्यवधान से किसी निर्णय पर पहुंचना चाहिए।
उन्होंने कहा,''बिना निर्णय के कोई भी राज्य तरक्की नहीं कर सकता। बेहतर बहस से लोकतंत्र मज़बूत होता है, और सहयोग एवं आम सहमति बनाने से देश मजबूत होता है। यह प्रबोधन कार्यक्रम ठीक इसी लक्ष्य को हासिल करने के लिए बनाया गया है।''
राधाकृष्णन ने विधायी कार्यवाही को मजबूत बनाने में प्रौद्योगिकी की भूमिका पर भी जोर दिया।
उन्होंने कहा, ''हम सभी डिजिटल युग में रह रहे हैं। लंबे वर्षों का अनुभव रखने वाले विधायकों को भी विधायी कार्यवाही को मजबूत बनाने के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) सहित उभरती प्रौद्योगिकियों की जानकारी रखनी चाहिए।''
उपराष्ट्रपति ने कहा, '' बिहार हमेशा से भारत के लिए मार्गदर्शक रहा है। लोकतंत्र भारत के लिए कोई नई अवधारणा नहीं है। दुनिया में लोकतंत्र को अपनाए जाने से बहुत पहले ही बिहार के वैशाली में गणतंत्र मौजूद था। इसीलिए हम भारत को लोकतंत्र की जननी कहते हैं।''
भाषा राजकुमार माधव
माधव
1107 1735 पटना