अयातुल्ला खामेनेई: अमेरिका से टकराव के दौरान दृढ़ता के साथ किया ईरान का नेतृत्व
पवनेश
- 03 Jul 2026, 04:33 PM
- Updated: 04:33 PM
दुबई, तीन जुलाई (एपी) ईरान के तीन दशक से अधिक समय तक सर्वोच्च नेता रहे अयातुल्ला अली खामेनेई ने इस दौरान देश को पूरी तरह बदल दिया। उन्होंने ईरान को एक मजबूत क्षेत्रीय ताकत बनाया, जिसकी वजह से इजराइल तथा अमेरिका से उसका टकराव लगातार बढ़ता गया।
अमेरिका और इजराइल से हुए युद्ध की शुरुआत में उनकी मौत हो गई थी। दफनाए जाने से पहले उनकी कई दिन तक चलने वाली अंतिम यात्रा शनिवार से शुरू होगी।
साल 1989 में अयातुल्ला रुहुल्ला खुमैनी की मौत के बाद खामेनेई ने देश की कमान संभाली। खुमैनी वही नेता थे जिन्होंने शाह की सरकार को हटाकर ईरान में शिया मुस्लिम धर्मगुरुओं का शासन स्थापित किया था। खामेनेई की धार्मिक पहचान पहले ज्यादा मजबूत नहीं थी, लेकिन उन्होंने खुमैनी के क्रांतिकारी विचारों को एक स्थायी सरकारी व्यवस्था का रूप देने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
उन्होंने पश्चिम एशिया के कई हथियारबंद समूहों का समर्थन किया, ईरान के परमाणु कार्यक्रम को बढ़ावा दिया और कई बार हुए विरोध प्रदर्शनों को सख्ती से दबाया। अमेरिका और इजराइल के साथ उनका टकराव देश में उनके प्रति समर्थन का कारण बना, लेकिन आखिर में यही उनकी मौत की वजह भी बना।
1980 के दशक में इराक से हुए युद्ध के बाद खामेनेई ने रिवोल्यूशनरी गार्ड को अपने शासन का सबसे महत्वपूर्ण आधार बना दिया। रिवॉल्यूशनरी गार्ड सेना और कारोबार दोनों में बहुत शक्तिशाली बन गया। यह ईरान की सबसे मजबूत सैन्य ताकत बना और देश के कई आर्थिक क्षेत्रों में इसकी बड़ी भूमिका रही।
खामेनेई के शासन में ईरान ने पारंपरिक युद्ध की जगह सहयोगी हथियारबंद समूहों को समर्थन देने की नीति अपनाई। इसे "एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस" कहा गया।
"एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस" के तहत ईरान ने लेबनान के हथियारबंद संगठन हिज्बुल्ला का समर्थन किया। हिज्बुल्ला ने साल 2000 में इजराइल को दक्षिणी लेबनान से हटने पर मजबूर किया और उसके बाद कई बार इजराइली सेना से लड़ाई की।
ईरान ने यमन के हूती विद्रोहियों का भी समर्थन किया। हूतियों ने 2014 में देश की राजधानी सना पर कब्जा कर लिया और एक दशक से अधिक समय तक जारी युद्ध के बावजूद वहां बने रहे। ईरान ने फलस्तीनी संगठन हमास का भी समर्थन किया, जिसने गाजा में इजराइल के खिलाफ लड़ाई लड़ी। ईरान समर्थित हथियारबंद समूहों ने इराक में अमेरिकी सेना के खिलाफ भी संघर्ष किया।
लेकिन सात अक्टूबर 2023 को इजराइल पर हमास के हमले के बाद पश्चिम एशिया में शुरू हुए युद्ध से "एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस" कमजोर पड़ गया। इससे हमास और हिज्बुल्ला दोनों की ताकत कम हो गई।
कई दशकों तक खामेनेई ने संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंधों की परवाह नहीं की और ईरान के परमाणु कार्यक्रम को आगे बढ़ाते रहे। अमेरिका और उसके सहयोगी देशों का कहना है कि 2003 तक इस कार्यक्रम के पीछे परमाणु हथियार बनाने की एक गुप्त योजना छिपी हुई थी।
खामेनेई ने मौखिक फतवा (धार्मिक आदेश) दिया था कि परमाणु हथियार इस्लाम के खिलाफ हैं। लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि ईरान शांतिपूर्ण परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम चलाने का अपना अधिकार कभी नहीं छोड़ेगा।
साल 2015 के परमाणु समझौते के तहत ईरान ने यूरेनियम के भंडार और उसके संवर्धन को काफी कम करने पर सहमति जताई। बदले में उस पर लगे प्रतिबंध हटाए जाने थे। लेकिन 2018 में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस समझौते से अमेरिका को बाहर कर लिया। इस फैसले का इजराइल ने स्वागत किया। इसके बाद ईरान ने लगभग हथियार बनाने के लिए जरूरी स्तर तक संवर्धित यूरेनियम का बड़ा भंडार जमा कर लिया। इजराइल और अमेरिका के कुछ अधिकारियों ने चिंता जताई कि अगर ईरान चाहे तो इसका इस्तेमाल परमाणु हथियार बनाने में कर सकता है।
साल 2025 में अमेरिका और इजराइल की बमबारी और इसके बाद शुरू हुए युद्ध दोनों में ईरान के परमाणु कार्यक्रम को निशाना बनाया गया।
राजनीतिक दमन और ईरान की कमजोर होती अर्थव्यवस्था के कारण समय-समय पर बड़े विरोध प्रदर्शन हुए।
साल 2009 में सुधारवादी विपक्ष ने आरोप लगाया कि कट्टरपंथी राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद की दोबारा जीत में धांधली हुई है। इसके बाद प्रदर्शन हुए। कार्रवाई में कई लोग मारे गए और सैकड़ों लोगों को गिरफ्तार किया गया।
साल 2017 में आर्थिक मुद्दों को लेकर प्रदर्शन शुरू हुए। 2019 में पेट्रोल की कीमत बढ़ाए जाने के बाद प्रदर्शन और तेज हो गए। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के अनुसार, कार्रवाई में 300 से ज्यादा लोग मारे गए।
साल 2022 में हिजाब सही तरीके से नहीं पहनने के लिए हिरासत में ली गई महिला महसा अमीनी की मौत के बाद फिर बड़े स्तर पर प्रदर्शन हुए। प्रदर्शनकारियों पर सुरक्षा बलों की कार्रवाई में 500 से ज्यादा लोग मारे गए और हजारों लोगों को गिरफ्तार किया गया।
साल 2025 के आखिर में आर्थिक मुद्दों को लेकर फिर प्रदर्शन शुरू हुए। बाद में यह अब तक का सबसे बड़ा आंदोलन बन गया। देशभर में लाखों लोग सड़कों पर उतर आए और इस्लामिक व्यवस्था को खत्म करने की मांग करने लगे।
मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि कार्रवाई में कम से कम 7,000 लोग मारे गए। इस सख्त कार्रवाई ने ईरान के लोगों को झकझोर दिया।
खामेनेई की मौत के बाद इस्लामिक गणराज्य के भविष्य को लेकर कई सवाल खड़े हो गए। उनके बेटे अयातुल्ला मुजतबा खामेनेई को अगला सर्वोच्च नेता चुना गया है। लेकिन माना जाता है कि जिस हमले में उनके पिता की मौत हुई, उसमें वह भी घायल हो गए थे और तब से सार्वजनिक रूप से नजर नहीं आए हैं।
युद्ध शुरू करते समय अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के लोगों से कहा था कि वे "खुद सरकार चलाएं।"
हालांकि अब तक ऐसे किसी बड़े जनविद्रोह के संकेत नहीं मिले हैं। इसके बजाय कट्टरपंथी समर्थक हर रात तेहरान की सड़कों पर इकट्ठा हो रहे हैं।
अयातुल्ला खामेनेई के अंतिम संस्कार के बाद क्या होगा, यह काफी हद तक रिवोल्यूशनरी गार्ड जैसे संगठनों पर निर्भर करेगा। ये संगठन पहले भी दिखा चुके हैं कि वे सत्ता कायम रखने के लिए पूरी ताकत इस्तेमाल करने को तैयार हैं।
एपी जोहेब पवनेश
पवनेश
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