अल नीनो की आशंका से आंध्र के किसानों ने जल-बचत वाली धान पद्धतियों की ओर किया रुख
मनीषा
- 18 Jun 2026, 01:00 PM
- Updated: 01:00 PM
(लक्ष्मी देवी ऐरे)
श्रीकाकुलम (आंध्र प्रदेश), 18 जून (भाषा) आंध्र प्रदेश के श्रीकाकुलम जिले के जेआर पुरम गांव के 52 वर्षीय किसान माज्जी सत्यम मई से ही आसमान की ओर नजर लगाए हुए हैं। पांच एकड़ जमीन, दो बोरवेल और पीढ़ियों से चली आ रही पारंपरिक धान की खेती, नर्सरी में पौधे तैयार कर उन्हें पानी से भरे खेतों में रोपना उनकी खेती का तरीका रहा है। हालांकि, इस खरीफ मौसम में उन्होंने कुछ अलग करने का फैसला किया है।
दवा क्षेत्र की प्रमुख कंपनी डॉ. रेड्डीज लैबोरेटरीज की कॉरपोरेट सामाजिक जिम्मेदारी (सीएसआर) निधि से लाभान्वित पारिवारिक ट्रस्ट डॉ. रेड्डीज फाउंडेशन से वर्षों के प्रशिक्षण के सहारे उन्होंने कुछ अलग करने की कोशिश की है।
सत्यम ने कहा, '' पिछले साल मई में ही बारिश आ गई थी, लेकिन इस साल अभी तक नहीं आई। सुना है कि अल नीनो के कारण बारिश कम होगी, इसलिए मैंने डीएसआर अपनाने का फैसला किया है।''
डीएसआर यानी 'डायरेक्ट सीडेड राइस' में नर्सरी और रोपाई की जरूरत नहीं होती। बीज सीधे खेत में डाले जाते हैं और पानी भरकर रखने की जरूरत भी नहीं होती। कम बारिश की स्थिति में यह तरीका किसानों के लिए आकर्षक बन रहा है।
सिर्फ सत्यम ही नहीं, श्रीकाकुलम और विजयनगरम जिलों के हजारों किसान धीरे-धीरे पानी की अधिक खपत वाली पारंपरिक खेती से हटकर नई पद्धतियों की ओर बढ़ रहे हैं। डॉ. रेड्डीज फाउंडेशन यहां 1,500 से अधिक गांवों में लगभग 10 लाख एकड़ धान क्षेत्र में काम कर रहा है।
राज्य कृषि विभाग एवं कृषि विज्ञान केंद्र भी किसानों को धान की खेती कम करने, कम अवधि वाली फसलें अपनाने या दलहन व अनाज की ओर जाने की सलाह दे रहे हैं।
सत्यम ने कहा, '' अगर अल नीनो ज्यादा प्रभावी हुआ तो हम केवल घरेलू उपयोग के लिए ही धान उगाएंगे।''
इसी गांव के 50 वर्षीय आर. सन्यास राव ने पहले ही बदलाव शुरू कर दिया है। उन्होंने पिछले साल गीली डीएसआर पद्धति अपनाई और पाया कि इससे मजदूरी लागत कम हुई और नर्सरी का झंझट खत्म हो गया।
इस साल वह दो एकड़ में सूखी डीएसआर और तीन एकड़ में मक्का उगाने की योजना बना रहे हैं।
आंकड़े भी इस बदलाव को सही ठहराते हैं। पारंपरिक धान खेती में बहुत अधिक पानी लगता है, जबकि डीएसआर और 'ऑल्टरनेट वेटिंग एंड ड्राइंग' (एडब्ल्यूडी) तकनीक से पानी की खपत काफी कम हो जाती है।
डॉ. रेड्डीज फाउंडेशन के निदेशक (ग्रामीण आजीविका और जलवायु कार्रवाई) सुमन सरस्वतीबतला ने कहा, '' सूखी डीएसआर से प्रति एकड़ लगभग 11-12 लाख लीटर पानी बचता है, गीली डीएसआर से 4-5.5 लाख लीटर और एडब्ल्यूडी से 3-5 लाख लीटर पानी की बचत होती है।''
पिछले साल इन दोनों जिलों में 3,667 एकड़ में डीएसआर और 21,963 एकड़ में एडब्ल्यूडी पद्धति अपनाई गई, जिससे 3,000 करोड़ लीटर से अधिक पानी बचा और 50,000 टन कार्बन उत्सर्जन में कमी आई।
इन तकनीकों के सफल उपयोग के लिए मिट्टी की ऊपरी 30-40 सेंटीमीटर परत में नमी बनाए रखना जरूरी होता है, जो बुवाई के समय को प्रभावित करता है।
श्रीकाकुलम में बुवाई का समय भी बदल रहा है। पहले जून के अंत में बुवाई होती थी, लेकिन अब यह जुलाई में हो रही है और रोपाई अगस्त में पहुंच गई है।
इस अंतराल को भरने के लिए किसानों को मई-जून में उड़द, मूंग और तिल जैसी अल्पावधि फसलें उगाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। साथ ही सनहेम्प और नेपियर जैसी फसलें मिट्टी की नमी बनाए रखने में मदद कर रही हैं।
पिछले साल 2,372 एकड़ में फसलें उगाई गईं और 1,508 एकड़ में कृषि-वनीकरण (नारियल के बागों में लकड़ी और फल वाले पौधे मिलाना) अपनाया गया। इस साल इनके और बढ़ने की उम्मीद है।
इस पूरे बदलाव के पीछे मिट्टी की उर्वरता भी एक बड़ी चिंता है। हैदराबाद स्थित प्रयोगशाला के जरिये किसानों को मिट्टी जांच की त्वरित रिपोर्ट और सलाह दी जा रही है।
फाउंडेशन पिछले पांच वर्षों से जागरूकता अभियान चला रहा है, जिसमें किसानों को मिट्टी की जरूरत के अनुसार उर्वरक उपयोग करने की सलाह दी जा रही है। हालांकि, पीढ़ियों से चली आ रही खेती की आदतों को बदलना आसान नहीं है, लेकिन पानी की अनिश्चितता वाले इस क्षेत्र में किसान अब समझने लगे हैं कि पुराने तरीके हमेशा सुरक्षित नहीं हैं।
राव ने कहा, '' डीएसआर अपनाने के प्रति जागरूकता बढ़ रही है। मैं जुलाई में बुवाई का फैसला करूंगा।''
अंततः, हर साल की तरह मानसून ही तय करेगा कि खेती का भविष्य कैसा रहेगा।
भाषा निहारिका मनीषा
मनीषा
1806 1300 श्रीकाकुलम