ब्रिटिश पुलिस ने बंबई उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश को सुरक्षा मुहैया कराई
रंजन
- 10 Jun 2026, 09:21 PM
- Updated: 09:21 PM
मुंबई, 10 जून (भाषा) ब्रिटिश पुलिस ने दाऊदी बोहरा समुदाय में उत्तराधिकार के विवाद को लेकर 2024 में दिए गए अहम फैसले के बाद कई धमकियों का सामना कर रहे बंबई उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश गौतम पटेल और उनके परिवार को सुरक्षा मुहैया कराई है। आधिकारिक सूत्रों ने बुधवार को यह जानकारी दी।
ब्रिटिश पुलिस ने यह कदम भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत द्वारा लंदन में नियुक्त भारतीय उच्चायुक्त पी. कुमारन के समक्ष यह मुद्दा उठाए जाने के एक दिन बाद उठाया है। न्यायमूर्ति सूर्यकांत इस समय ब्रिटेन की आधिकारिक यात्रा पर हैं।
भारतीय उच्चायुक्त ने सीजेआई को भरोसा दिया था कि वह ब्रिटिश अधिकारियों के समक्ष इस मामले को उठाएंगे ताकि सेवानिवृत्त न्यायाधीश और उनके परिवार के लिए पर्याप्त सुरक्षा का इंतजाम किया जा सके।
सेवानिवृत्त न्यायाधीश पटेल ने 'पीटीआई-भाषा' से बातचीत में डराने-धमकाने की कोशिश को ''शासन और न्यायपालिका पर हमला'' करार दिया और कहा कि वह दोषियों की ''बेतुकी'' मांगों के आगे नहीं झुकेंगे।
परिवार के सूत्रों के मुताबिक, न्यायमूर्ति पटेल और उनके परिवार को गत 10 महीने में कई गुमनाम धमकी भरे पत्र मिले हैं। उन्होंने बताया कि यह स्थिति तब गंभीर हो गई जब पांच जून को न्यायमूर्ति पटेल की बेटी के लंदन स्थित घर पर जर्मनी के डाकघर की मुहर लगा एक बेहद धमकी भरा पत्र भेजा गया।
इस पत्र में जान से मारने की धमकी देने के साथ दावा किया कि परिवार की 'सुपारी' (पैसे लेकर हत्या करने का ठेका) दी गई है। साथ ही, इसमें एक 'डिजिटल स्टोरेज डिवाइस' भी था, जिसे अब लंदन पुलिस को सौंप दिया गया है।
पत्र भेजने वाले ने सेवानिवृत्त न्यायाधीश से मांग की कि वह यूट्यूब पर एक वीडियो पोस्ट करके अपने फैसले के लिए माफी मांगें और यह दावा करें कि उन्होंने फैसला ''दबाव में और जबरदस्ती'' में दिया था।
न्यायमूर्ति पटेल ने कहा कि वे धमकी भरे पत्रों में की गई 'बेतुकी' मांगों के आगे नहीं झुकेंगे, जिनमें उनसे यूट्यूब पर एक वीडियो जारी करके अपना फैसला वापस लेने को कहा गया है।
न्यायमूर्ति पटेल ने लंदन से फोन पर 'पीटीआई-भाषा' से की गई बातचीत में कहा, ''यह न्यायपालिका और शासन-व्यवस्था पर हमला है। भविष्य में अगर किसी न्यायाधीश को ऐसी स्थिति का सामना करना पड़े, तो कौन शपथ लेगा?''
उन्होंने पुष्टि की कि धमकियों और उनकी बेटी पर हुए हमले की पुलिस जांच कर रही है।
सेवानिवृत्त न्यायाधीश ने न्यायिक प्रक्रिया की गरिमा का बचाव करते हुए कहा, ''भारत में कई धर्म हैं, लेकिन न्यायपालिका में हमारे लिए और मेरे लिए, सबसे पवित्र किताब भारत का संविधान है। जब मैंने शपथ ली थी, तो मैंने एक वादा किया था और उससे समझौता नहीं किया जा सकता। मैं अपने कर्तव्यों और उस वादे के साथ धोखा नहीं कर सकता।''
उन्होंने कहा कि उत्तराधिकार का यह जटिल मामला एक दशक से उनके पास लंबित था, और उस दौरान उन्हें किसी भी पक्ष से कोई परेशानी नहीं हुई।
पूर्व न्यायाधीश ने कहा कि इस मामले में वे सीधे तौर पर पीड़ित हैं, लेकिन ऐसे मामलों में असल पीड़ित तो पूरा समाज होता है।
इस बीच, वकीलों के तीन संगठनों ने बुधवार को बंबई उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर कर इस मामले में न्यायिक हस्तक्षेप की मांग की।
याचिका में उच्च न्यायालय से आग्रह किया गया है कि वह संबंधित अधिकारियों को निर्देश दे कि वे धमकियों के मद्देनजर न्यायमूर्ति पटेल और उनके परिवार को सुरक्षा मुहैया कराएं।
याचिका का उल्लेख बुधवार को कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश आर.वी. घुगे और न्यायमूर्ति गौतम अनखड़ की पीठ के समक्ष किया गया। पीठ ने कहा कि मामले को सुनवाई के लिए उचित समय पर सूचीबद्ध किया जाएगा।
याचिका में कहा गया, ''ये हमले और धमकियां न्यायपालिका की आजादी पर सीधा आक्रमण हैं। इनका मकसद उस फैसले के खिलाफ अपील की सुनवाई कर रहे न्यायाधीशों को डराना भी हो सकता है, इस प्रकार यह न्याय-प्रक्रिया में हस्तक्षेप है।''
इसमें कहा गया है कि न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा और संरक्षा सबसे जरूरी है, ताकि वे बिना किसी डर या पक्षपात के अपने संवैधानिक कर्तव्यों का पालन कर सकें।
यह जनहित याचिका बंबई बार एसोसिएशन, एडवोकेट्स एसोसिएशन ऑफ वेस्टर्न इंडिया और बंबई इनकॉर्पोरेटेड लॉ सोसाइटी ने दायर की है।
याचिका में उच्च न्यायालय से अनुरोध किया गया है कि वह उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक विशेष जांच टीम (एसआईटी) बनाए और/या केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) या महाराष्ट्र सरकार को इन हमलों और धमकियों की गहन जांच करने का निर्देश दे।
याचिका में न्यायमूर्ति पटेल और उनके परिवार को भारत में पर्याप्त सुरक्षा मुहैया कराने का भी अनुरोध किया गया है।
न्यायमूर्ति पटेल की एकल पीठ ने 24 अप्रैल 2024 को दाऊदी बोहरा समुदाय के 53वें दाई-अल-मुतलक (नेता) के तौर पर सैयदना मुफद्दल सैफुद्दीन के पद को बरकरार रखा और कहा कि उनके पास वैध 'नस्स' (नियुक्ति) थी।
न्यायमूर्ति पटेल ने खुज़ैमा कुतुबुद्दीन द्वारा 2014 में दायर किए गए उस मुकदमे को खारिज कर दिया, जो उन्होंने अपने भाई और तत्कालीन सैयदना मोहम्मद बुरहानुद्दीन (52वें दाई) के जनवरी 2014 में 102 साल की उम्र में निधन के तुरंत बाद दायर किया गया था। इसके बाद बुरहानुद्दीन के दूसरे बेटे, मुफद्दल सैफुद्दीन ने 53वें सैयदना के तौर पर जिम्मेदारी संभाली।
कुतुबुद्दीन का 2016 में निधन हो गया और उसके बाद उनके बेटे ताहिर फखरुद्दीन इस मामले में पक्षकार बने और दावा किया कि उनके पिता ने उन्हें ये अधिकार सौंपे थे।
फैसले में न्यायमूर्ति पटेल ने कहा था कि वादी यह साबित करने के लिए कोई सबूत पेश नहीं कर पाए कि 52वें दाई ने कुतुबुद्दीन को 'नस्' (नियुक्ति)दिया था।
न्यायमूर्ति पटेल 25 अप्रैल 2024 को सेवानिवृत्त हुए।
बाद में वादियों ने एकल पीठ के इस फैसले को उच्च न्यायालय की खंडपीठ में चुनौती दी और अबतक यह मामला लंबित है।
भाषा धीरज रंजन
रंजन
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