शीर्ष अदालत ने आवारा कुत्तों के मुद्दे पर जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया : मेनका गांधी
पवनेश
- 19 May 2026, 07:40 PM
- Updated: 07:40 PM
नयी दिल्ली, 19 मई (भाषा) पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं पशु अधिकार कार्यकर्ता मेनका गांधी ने मंगलवार को कहा कि उच्चतम न्यायालय ने आवारा कुत्तों के मुद्दे पर "पूरी तरह से अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया है"।
उन्होंने दलील दी कि न्यायालय के पिछले निर्देश देशभर में लागू नहीं हुए और उन्हें पूरा करना "तकनीकी रूप से व्यावहारिक नहीं" था।
मेनका की यह टिप्पणी शीर्ष अदालत द्वारा आवारा कुत्तों को स्थानांतरित करने और उनकी नसबंदी करने से जुड़े अपने नवंबर 2025 के आदेश को वापस लेने से इनकार करने के बाद आई।
शीर्ष अदालत ने इस बात पर जोर दिया था कि सम्मान के साथ जीने के अधिकार में किसी कुत्ते के हमले के डर के बिना स्वतंत्र रूप से घूमने का अधिकार भी शामिल है।
अदालत के इस फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए गांधी ने 'पीटीआई-वीडियो' से कहा, "न्यायालय ने कुछ नहीं किया है, उसने बस जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया है और कहा है कि यदि आप चाहें तो उच्च न्यायालय जा सकते हैं।''
उन्होंने कहा कि शीर्ष अदालत ने पिछले छह महीनों में आदेश के क्रियान्वयन की व्यापक विफलता पर ध्यान दिए बिना, केवल अपने पिछले निर्देशों को ही दोहराया है।
पूर्व केंद्रीय मंत्री ने कहा, ''इसने (न्यायालय ने) केवल इतना कहा है कि हमने नवंबर में जो कहा था, उसे किया जाना चाहिए था। नवंबर से लेकर अब तक किसी ने कुछ नहीं किया। छह महीने बीत चुके हैं। एक भी 'पशु जन्म नियंत्रण' (एबीसी) केंद्र नहीं बनाया गया है।''
उन्होंने आगे कहा, ''एक भी आश्रय स्थल नहीं बनाया गया है। न किसी अस्पताल, न बस पड़ाव, न किसी विद्यालय, न महाविद्यालय, किसी ने भी कुत्तों को नहीं हटाया है, क्योंकि वे ऐसा कर ही नहीं सकते.... यह तकनीकी रूप से व्यावहारिक नहीं है।''
उच्चतम न्यायालय ने अपने पिछले आदेश को वापस लेने संबंधी याचिकाएं खारिज करते हुए कहा कि आवारा कुत्तों द्वारा बच्चों, बुजुर्गों और यात्रियों को काटने की घटनाओं में वृद्धि हुई है और अधिकारी इस ''कठोर जमीनी वास्तविकताओं'' की अनदेखी नहीं कर सकते।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति एन. वी. अंजारिया के पीठ ने पाया कि आवारा कुत्तों की नसबंदी, टीकाकरण, आश्रय और पशु जन्म नियंत्रण ढांचे का क्रियान्वयन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में ''छिटपुट, कम वित्त-पोषित और असमान'' बना हुआ है।
पीठ ने कहा कि लंबे समय तक निष्क्रियता और संस्थागत प्रतिबद्धता की कमी ने समस्या को और बढ़ा दिया है तथा इसके लिए तत्काल प्रणालीगत हस्तक्षेप की आवश्यकता है।
मेनका ने एक बार फिर कहा, ''मुझे लगता है कि इन छह महीनों में, शीर्ष न्यायालय को यह एहसास हो गया है कि राष्ट्रीय स्तर पर आदेश का उल्लंघन हुआ है। यह केवल एक राज्य या एक जिले की बात नहीं है, किसी ने भी वैसा नहीं किया, जैसा उन्होंने (न्यायाधीशों ने) कहा था।''
उन्होंने कहा, ''इसलिए इसके परिणामस्वरूप, उन्होंने (न्यायाधीशों ने) कह दिया है कि ठीक है, अब यदि आपको कोई समस्या है, तो उच्च न्यायालय जाएं। बस इतनी सी बात है।''
भाषा सुरेश पवनेश
पवनेश
1905 1940 दिल्ली