आरटीआई अधिनियम के तहत 'सार्वजनिक प्राधिकरण' नहीं है बीसीसीआई: सीआईसी
सुरेश
- 18 May 2026, 07:54 PM
- Updated: 07:54 PM
नयी दिल्ली, 18 मई (भाषा) केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) ने सोमवार को कहा कि भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम के तहत एक "सार्वजनिक प्राधिकरण" नहीं है, इसलिए वह इस कानून के तहत किसी भी प्रश्न का उत्तर देने के लिए बाध्य नहीं है।
इसके साथ ही सीआईसी ने इस संबंध में 2018 का अपना ही आदेश पलट दिया।
सूचना आयुक्त पी. आर. रमेश ने कहा कि भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई), यद्यपि क्रिकेट प्रशासन और अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट में भारत के प्रतिनिधित्व से जुड़े महत्वपूर्ण सार्वजनिक कार्य करता है, फिर भी उसे 'सार्वजनिक प्राधिकरण' नहीं माना जा सकता, क्योंकि यह न तो सरकार के स्वामित्व में है, न सरकार द्वारा नियंत्रित है और न ही सरकार द्वारा पर्याप्त रूप से वित्त-पोषित है।
सूचना आयुक्त रमेश ने आदेश में कहा, ''बीसीसीआई को आरटीआई अधिनियम की धारा 2(एच) के अर्थ में 'सार्वजनिक प्राधिकरण' के तौर पर वर्गीकृत नहीं किया जा सकता, इसलिए वर्तमान मामले की परिस्थितियों में आरटीआई अधिनियम के प्रावधान उस पर लागू नहीं होते हैं।''
इसके साथ ही, आयोग ने वह अपील खारिज कर दी जिसमें उन प्रावधानों और प्राधिकार के बारे में सूचना मांगी गई थी, जिसके तहत बीसीसीआई भारत का प्रतिनिधित्व करता है और राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट टूर्नामेंट के लिए खिलाड़ियों का चयन करता है।
बीसीसीआई की मौजूदा संरचना और कार्यप्रणाली दुनिया के अन्य प्रमुख क्रिकेट बोर्ड, जैसे-इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका, वेस्टइंडीज और पाकिस्तान- के समान है। ये सभी बोर्ड सीधे तौर पर पारदर्शिता कानूनों के दायरे में नहीं आते और स्वायत्त या निजी निकायों के रूप में कार्य करते हैं, हालांकि इनमें से कई संगठन स्वेच्छा से वित्तीय और प्रशासनिक जानकारी सार्वजनिक करते हैं।
इस फैसले ने वर्ष 2018 के तत्कालीन सूचना आयुक्त एवं विधि के प्रख्यात प्रोफेसर एम. श्रीधर आचार्युलु के उस आदेश को पलट दिया, जिसमें उन्होंने बीसीसीआई को 'सार्वजनिक प्राधिकरण' माना था और इसके अध्यक्ष, सचिव तथा प्रशासकों की समिति को आरटीआई अधिनियम के तहत केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी, सहायक लोक सूचना अधिकारी एवं प्रथम अपीलीय प्राधिकार नियुक्त करने का निर्देश दिया था।
केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) ने उस वक्त यह भी निर्देश दिया था कि बीसीसीआई आरटीआई अधिनियम की धारा-4 के तहत स्वप्रेरित रूप से जानकारी सार्वजनिक करे तथा आरटीआई आवेदक को बिंदुवार उत्तर उपलब्ध कराए।
हालांकि, बीसीसीआई ने उक्त आदेश को मद्रास उच्च न्यायालय में चुनौती दी थी, जिसने सितंबर 2025 में मामले को ''बीसीसीआई बनाम क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ बिहार'' प्रकरण में उच्चतम न्यायालय द्वारा की गई टिप्पणी के आलोक में पुनर्विचार के लिए सीआईसी को वापस भेज दिया था और कहा था कि आयोग को कानूनी स्थिति की पुनः समीक्षा करके नया आदेश पारित करना चाहिए।
सीआईसी ने मामले पर पुनर्विचार करते हुए कहा कि बीसीसीआई एक निजी स्वायत्त निकाय है, जो 'तमिलनाडु सोसाइटी पंजीकरण कानून' के तहत पंजीकृत है और इसका गठन न तो संविधान, संसद अथवा राज्य विधानमंडल द्वारा किया गया है, और न ही किसी सरकारी अधिसूचना के जरिये।''
आयोग ने कहा कि यह क्रिकेट निकाय मीडिया अधिकारों, प्रायोजन समझौतों, टिकट बिक्री, प्रसारण अनुबंधों और वाणिज्यिक क्रिकेट गतिविधियों से अर्जित राजस्व के माध्यम से स्वतंत्र रूप से कार्य करता है।
आयोग ने कहा, ''सरकार का बीसीसीआई के कार्यों, वित्त, प्रशासन, प्रबंधन एवं उसके समस्त मामलों पर कोई नियंत्रण नहीं है। इसलिए इसे 'सार्वजनिक प्राधिकरण' का दर्जा नहीं दिया जा सकता।''
यह दलील खारिज करते हुए कि राष्ट्रीय टीम के चयन और भारत में क्रिकेट के नियमन में बीसीसीआई की भूमिका इसे सार्वजनिक प्राधिकरण का स्वरूप प्रदान करती है, आयोग ने कहा, ''आरटीआई अधिनियम में 'सार्वजनिक कार्य' को सार्वजनिक प्राधिकरण के निर्धारण के मानदंड के रूप में शामिल नहीं किया गया है।''
यह मामला वर्ष 2017 की एक आरटीआई याचिका से जुड़ा है, जिसमें पूछा गया था कि बीसीसीआई किस प्राधिकार के तहत भारत का प्रतिनिधित्व करता है, खिलाड़ियों का चयन करता है तथा क्रिकेट आधारभूत ढांचे और सुरक्षा व्यवस्थाओं के लिए सरकारी सहायता प्राप्त करता है।
युवा मामले एवं खेल मंत्रालय ने उत्तर दिया था कि मांगी गई जानकारी उसके पास उपलब्ध नहीं है और आवेदन को बीसीसीआई को नहीं भेजा जा सकता, क्योंकि उसने स्वयं को 'सार्वजनिक प्राधिकरण' घोषित नहीं किया है।
सीआईसी ने इन निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए उच्चतम न्यायालय के कई निर्णयों पर भरोसा जताया कि किसी निकाय पर केवल नियामकीय निगरानी होना या उसका सार्वजनिक महत्व का होना ही उसे आरटीआई अधिनियम के तहत 'सार्वजनिक प्राधिकरण' नहीं बनाता, जब तक कि वह निकाय सरकार द्वारा पर्याप्त रूप से नियंत्रित या वित्त-पोषित न हो।
भाषा अमित सुरेश
सुरेश
1805 1954 दिल्ली