सीबीएसई की त्रि-भाषा नीति के कार्यान्वयन के समय, तैयारियों को लेकर सवाल उठे
सुरेश
- 17 May 2026, 10:01 PM
- Updated: 10:01 PM
नयी दिल्ली, 17 मई (भाषा) शिक्षाविदों और अभिभावकों के एक वर्ग ने कक्षा नौ के छात्रों के लिए केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) की त्रि-भाषा नीति के कार्यान्वयन के समय पर चिंता जताते हुए स्कूलों की तैयारियों को लेकर सवाल उठाए हैं।
सीबीएसई ने शुक्रवार को नौवीं कक्षा के छात्रों के लिए इस साल एक जुलाई से कम से कम दो भारतीय भाषाओं सहित तीन भाषाओं को अनिवार्य कर दिया है, जबकि स्कूलों में नये शैक्षणिक सत्र के लिए कक्षाएं और यूनिट टेस्ट पहले ही शुरू हो चुके हैं।
माउंट आबू स्कूल की प्रधानाचार्या ज्योति अरोड़ा ने कहा कि यह नीति "अचानक" से लागू कर दी गई। उन्होंने कहा कि सुचारु कार्यान्वयन सुनिश्चित करने के लिए नीतिगत ढांचे के भीतर अंग्रेजी की स्थिति पर अधिक स्पष्टता की जरूरत है।
अरोड़ा ने 'पीटीआई-भाषा' से बातचीत में कहा कि सीबीएसई का त्रि-भाषा फॉर्मूला बेशक राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुरूप है, "जो एक बहुत ही प्रगतिशील दस्तावेज है", लेकिन शैक्षणिक सत्र शुरू होने के बाद इसके कार्यान्वयन ने हितधारकों के बीच "बेचैनी" पैदा कर दी है।
कक्षा नौ के एक छात्र की मां रोजी देवी ने कहा, "दिल्ली के एक नामी स्कूल में पढ़ने वाले मेरे बेटे ने पहली भाषा के रूप में अंग्रेजी और दूसरी भाषा के रूप में फ्रेंच को चुना है। अंग्रेजी और फ्रेंच दोनों के 40 अंकों के यूनिट टेस्ट पूरे हो चुके हैं और अचानक सीबीएसई के नये दिशा-निर्देशों के तहत उसे इन दोनों में से एक भाषा को छोड़ना पड़ रहा है।"
रोजा देवी ने सवाल किया, "नये शैक्षणिक सत्र के 45 दिन बीत जाने के बाद सीबीएसई ने अचानक ये दिशानिर्देश क्यों जारी किए हैं? आप पहले किसी चीज की अनुमति दे रहे हैं और दो महीने बाद कह रहे हैं कि आप ऐसा नहीं कर सकते। अगर सीबीएसई ने मार्च में दिशा-निर्देश जारी किए होते, तो हम तैयारी कर लेते या अन्य विकल्पों की तलाश कर लेते। क्या लोकतंत्र का मतलब सोच-समझकर फैसले लेना नहीं है? क्या सीबीएसई का निर्णय मनमाना नहीं है?"
पाठ्यक्रम में एक महत्वपूर्ण बदलाव अंग्रेजी को विदेशी भाषा के रूप में वर्गीकृत किया जाना है और बोर्ड त्रि-भाषा ढांचे के भीतर केवल एक विदेशी भाषा की अनुमति देता है। इससे छात्रों के लिए अंग्रेजी के साथ दूसरी या तीसरी भाषा के रूप में किसी अन्य विदेशी भाषा को चुनना मुश्किल हो सकता है।
कक्षा नौ की एक छात्रा की मां टीना सिंघल ने कहा, "मेरी बेटी ने छठी कक्षा से ही फ्रेंच को तीसरी भाषा के रूप में ले रखा था और उसने तय किया था कि कक्षा नौ में भी वह अंग्रेजी और फ्रेंच पढ़ना जारी रखेगी। उसने हिंदी पर कभी ज्यादा ध्यान नहीं दिया, क्योंकि पहले छात्रों को कक्षा नौ और 10 में कोई भी दो भाषाएं चुनने की छूट होती थी।"
सिंघल ने कहा, "फ्रेंच पढ़ने में दिलचस्पी होने के बावजूद अब अचानक उसे यह भाषा छोड़नी पड़ सकती है। वह महीनों से फ्रेंच की तैयारी कर रही है और अब बच्चों पर दबाव है, क्योंकि उन्हें एक अतिरिक्त भाषा भी सीखनी है।"
उन्होंने नीति के कार्यान्वयन में आने वाली तार्किक समस्याओं की ओर इशारा करते हुए कहा कि स्कूलों में व्यावहारिक रूप से सभी भाषा विकल्प उपलब्ध कराना संभव नहीं हो सकता है।
सिंघल ने कहा, "वे कह रहे हैं कि छात्र एक अतिरिक्त भाषा ले सकते हैं, लेकिन यह स्कूलों पर निर्भर करता है कि वे यह विकल्प प्रदान करते हैं या नहीं।" उन्होंने कहा कि विकल्पों की कमी के कारण छात्रों को हिंदी लेनी पड़ सकती है।
सिंघल ने चरणबद्ध तरीके से कार्यान्वयन की मांग करते हुए कहा, "कक्षा नौ में ये बदलाव अचानक नहीं किए जाने चाहिए थे। बच्चे पहले से ही पाठ्यक्रम और किताबों में बदलाव से जूझ रहे हैं। अब इस कदम से छात्रों और अभिभावकों का तनाव बढ़ गया है।"
माउंट आबू स्कूल की प्रधानाचार्या ने कहा कि यूनिट टेस्ट पहले ही हो चुके हैं, इसलिए स्कूलों को भाषा शिक्षकों की उपलब्धता, समय सारिणी के पुनर्गठन और शैक्षणिक समायोजन से संबंधित व्यावहारिक चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा।
अरोड़ा ने कहा कि कक्षा नौ में छात्रों से बिना पूर्व ज्ञान के एक नयी भाषा की पढ़ाई करने के लिए कहे जाने पर भी चिंता जताई।
उन्होंने कहा, "मान लीजिए कि मैं संस्कृत को तीसरी भाषा के रूप में पढ़ाना शुरू कर दूं। जिन बच्चों ने कक्षा छह, सात और आठ में संस्कृत नहीं पढ़ी है, वे इस भाषा को कैसे समझ पाएंगे?"
सीबीएसई के इस सुझाव पर कि कक्षा नौ के छात्र तीसरी भाषा के लिए अस्थायी रूप से कक्षा छह की पाठ्यपुस्तकों का इस्तेमाल कर सकते हैं, अरोड़ा ने कहा, "भाषा का परिचय कराने का यही एकमात्र उपाय है। जो लोग तीसरी भाषा (आर3) के लिए नये शिक्षार्थी हैं, उन्हें बुनियादी बातों से शुरुआत करनी होगी...।"
हालांकि, अरोड़ा ने नयी शिक्षा नीति के व्यापक उद्देश्य का समर्थन किया, लेकिन उन्होंने सीबीएसई के ताजा कदम के समय पर सवाल उठाया।
उन्होंने सवाल किया, "नीतिगत मामलों में किसी भी नयी चीज से हमें कोई आपत्ति नहीं है और हम हमेशा राष्ट्रीय शिक्षा नीति के साथ हैं। समस्या यह है कि सत्र की शुरुआत में ऐसा क्यों नहीं किया जाता? सत्र के बीच में कार्यान्वयन से कई कठिनाइयां सामने आती हैं।"
शिक्षाविद और करियर परामर्शदाता केशव अग्रवाल ने भी इस कदम के समय पर सवाल उठाया।
उन्होंने कहा, "सभी कक्षाओं के लिए किताबें अभी तक नहीं आई हैं। कई जगहों पर तीन भाषाएं पहले से ही छात्रों के लिए परेशानी का सबब बन रही हैं और फिर अभिभावकों पर यह बम गिरा दिया गया है। योजना बनाने में विफल रहना, विफल होने की योजना बनाने के समान है। सीबीएसई यह कब सीखेगा?"
अग्रवाल ने कहा, "भाषा नीति का स्वागत है। बच्चे को सीखने के लिए मजबूर करना खुशी की बात नहीं है; यह एक तरह का दबाव है, लेकिन समावेशी शिक्षा का अर्थ है बच्चे को स्वतंत्र चुनाव का अधिकार देना। जैसे ही आप चुनाव का अधिकार छीन लेते हैं, समावेश का अर्थ ही समाप्त हो जाता है।"
भाषा पारुल सुरेश
सुरेश
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