सीबीएसई के नौवीं कक्षा से त्रिभाषा फॉर्मूला लागू करने के मायने और प्रभाव
नेत्रपाल
- 17 May 2026, 06:34 PM
- Updated: 06:34 PM
नयी दिल्ली, 17 मई (भाषा) केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) ने 2026-27 शैक्षणिक सत्र शुरू होने के दो महीने बाद यानी एक जुलाई, 2026 से नौवीं कक्षा के लिए त्रिभाषा फॉर्मूला लागू करने के लिए अधिसूचना जारी की है।
इस सत्र के मायने और पड़ने वाले प्रभाव इस प्रकार हैं...
1) त्रिभाषा फॉर्मूला क्या है?
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 में त्रिभाषा फॉर्मूला के तहत छात्रों को तीन भाषाएं सीखनी अनिवार्य हैं, जिनमें कम से कम दो भारतीय भाषाएं होनी चाहिए। यह सूत्र सरकारी और निजी दोनों विद्यालयों पर लागू होगा, जिससे राज्यों को बिना किसी बाध्यता के भाषाएं चुनने की स्वतंत्रता मिलेगी।
2) त्रिभाषा फॉर्मूला का इतिहास क्या है?
इस सूत्र को पहले शिक्षा आयोग (1964-66) ने प्रस्तावित किया था, जिसे आधिकारिक तौर पर कोठारी आयोग के नाम से जाना जाता है। इसे तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नेतृत्व में राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनपीई) 1968 में औपचारिक रूप से अपनाया गया था। प्रधानमंत्री राजीव गांधी के नेतृत्व में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 में यह नीति दोहराई गई और भाषाई विविधता एवं राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने के लिए नरसिंह राव की कांग्रेस सरकार द्वारा 1992 में इसमें संशोधन किया गया।
इस फॉर्मूला में तीन भाषाएं शामिल थीं जिनमें मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा, आधिकारिक भाषा और एक आधुनिक भारतीय या यूरोपीय भाषा।
3) त्रिभाषा फॉर्मूला पर एनईपी 2020 क्या कहती है?
एनईपी में स्कूली स्तर से ही ''बहुभाषावाद को बढ़ावा देने के लिए त्रिभाषा फॉर्मूला लागू करने'' का प्रस्ताव है। दस्तावेज में कहा गया है कि ''संवैधानिक प्रावधानों, जनता, क्षेत्रों और संघ की आकांक्षाओं, बहुभाषावाद को बढ़ावा देने के साथ-साथ राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए'' त्रिभाषा फॉर्मूला लागू रहेगा।
हालांकि, नयी नीति में यह भी कहा गया है कि त्रिभाषा फॉर्मूला में अधिक लचीलापन होगा और किसी भी राज्य पर कोई भाषा थोपी नहीं जाएगी।
इस नीति में कहा गया है कि बच्चों द्वारा सीखी जाने वाली तीन भाषाएं राज्यों, क्षेत्रों और निश्चित रूप से, स्वयं छात्रों की पसंद होंगी, बशर्ते कि इन तीन भाषाओं में से कम से कम दो भाषाएं भारतीय हों।
4) विदेशी भाषाओं का क्या होगा?
एनईपी 2020 के अनुसार, भारतीय भाषाओं और अंग्रेजी के अलावा, माध्यमिक स्तर के छात्र कोरियाई, जापानी, फ्रेंच, जर्मन और स्पेनिश जैसी अन्य विदेशी भाषाएं भी सीख सकते हैं।
हालांकि, पाठ्यक्रम में एक महत्वपूर्ण बदलाव अंग्रेजी को विदेशी भाषा के रूप में वर्गीकृत करना है, जिसके तहत बोर्ड तीन-भाषा ढांचे के भीतर केवल एक विदेशी भाषा की अनुमति देता है। इससे छात्रों के लिए अंग्रेजी और दूसरी या तीसरी भाषा के रूप में किसी अन्य विदेशी भाषा को चुनने में बाधा आ सकती है।
5) क्या पाठ्यपुस्तकें तैयार हैं?
बोर्ड ने कहा है कि जब तक विशेष आर3 (तीसरी भाषा की) पाठ्यपुस्तकें उपलब्ध नहीं हो जातीं, नौवीं कक्षा के छात्र चयनित भाषा की छठी कक्षा की आर3 पाठ्यपुस्तकों (2026-27 संस्करण) का उपयोग करेंगे।
सीबीएसई ने कहा है कि जिन विद्यालयों में पर्याप्त रूप से योग्य भारतीय भाषा के शिक्षकों की कमी है, वे अंतरिम व्यवस्था के रूप में अन्य विषयों के मौजूदा शिक्षकों को नियुक्त कर सकते हैं, जिनके पास संबंधित भाषा में कार्यात्मक दक्षता हो।
6) त्रिभाषा फॉर्मूला को लेकर विवाद क्या है?
त्रिभाषा फॉर्मूला पूर्ववर्ती द्रविड़ मुनेत्र कषगम (द्रमुक) नीत तमिलनाडु सरकार और केंद्र सरकार के बीच राजनीतिक विवाद का मुख्य कारण रहा है।
राज्य ने ऐतिहासिक रूप सेत त्रि-भाषा व्यवस्था का विरोध किया है। 1937 में, सी. राजगोपालाचारी के नेतृत्व वाली तत्कालीन मद्रास सरकार ने विद्यालयों में हिंदी को अनिवार्य कर दिया था। इस कदम के विरोध में जस्टिस पार्टी और पेरियार जैसे द्रविड़ नेताओं द्वारा व्यापक विरोध प्रदर्शन किए गए। 1940 में इस नीति को रद्द कर दिया गया, लेकिन हिंदी विरोधी भावनाएं बनी रहीं।
जब 1968 में त्रि-भाषा फॉर्मूला लागू किया गया, तो तमिलनाडु ने इसे हिंदी थोपने की कोशिश करार देते हुए विरोध किया। तत्कालीन मुख्यमंत्री सी.एन. अन्नादुरई के नेतृत्व में, राज्य ने दो-भाषा की नीति अपनाई, जिसके तहत केवल तमिल और अंग्रेजी पढ़ाई जाती है।
तमिलनाडु एकमात्र ऐसा राज्य है जिसने कभी भी त्रिभाषा फॉर्मूला लागू नहीं किया है। उसने हिंदी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं सहित भारतीय भाषाओं के बजाय अंग्रेजी को चुना है।
भाषा धीरज नेत्रपाल
नेत्रपाल
1705 1834 दिल्ली