विहिप ने भोजशाला मामले पर मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय के फैसले का किया स्वागत
नरेश
- 15 May 2026, 08:02 PM
- Updated: 08:02 PM
(फाइल फोटो के साथ)
नयी दिल्ली, 15 मई (भाषा) विश्व हिंदू परिषद (विहिप) ने शुक्रवार को भोजशाला मामले में मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय के आदेश का स्वागत करते हुए कहा कि यह फैसला भारत की सांस्कृतिक विरासत और सनातन परंपरा पर बहुत बड़ी मुहर है।
मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने शुक्रवार को घोषणा की कि धार जिले में विवादित भोजशाला परिसर देवी सरस्वती को समर्पित एक मंदिर है तथा केंद्र और एएसआई इसके प्रशासन और प्रबंधन पर निर्णय ले सकते हैं। इसे हिंदू पक्ष के लिए एक बड़ी जीत के रूप में देखा जा रहा है।
विहिप के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक कुमार ने इस फैसले का स्वागत करते हुए कहा,''अब हिंदुओं को भोजशाला में निर्बाध पूजा-अर्चना करने का अधिकार होगा।''
कुमार ने एक बयान में कहा, ''मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने फैसला सुनाया है कि धार स्थित भोजशाला एक हिंदू मंदिर है। न्यायालय ने कहा कि भोजशाला में पूजा-अर्चना की विधि और परंपरा हमेशा से एक हिंदू मंदिर की ही रही है।''
उन्होंने कहा कि यह फैसला ''भारत की सांस्कृतिक चेतना, सत्य और सनातन परंपरा पर एक बहुत बड़ी मुहर है।'
उन्होंने कहा, ''भोजशाला को केवल मां वाग्देवी की पूजा स्थल बनकर नहीं रहना चाहिए, बल्कि प्राचीन काल की तरह एक बार फिर संस्कृत और धार्मिक ग्रंथों के अध्ययन के वैश्विक केंद्र के रूप में उभरना चाहिए।''
कुमार ने कहा, "इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए समाज और सरकार को मिलकर काम करना होगा। इस स्थान की आध्यात्मिक ऊर्जा विश्वभर में दिव्य प्रकाश फैलाएगी।"
फैसले को संतुलित और सकारात्मक बताते हुए विहिप नेता ने सभी वर्गों से निर्णय को स्वीकार करने और शांति एवं सद्भाव बनाए रखने की अपील की।
उन्होंने कहा,''यह किसी की जीत या हार नहीं है। हम सभी को अदालती आदेशों और संवैधानिक प्रक्रियाओं का सम्मान करना चाहिए। यह निर्णय किसी समुदाय की हार नहीं, बल्कि ऐतिहासिक सत्य और सांस्कृतिक न्याय की बहाली है।"
कुमार ने अदालत की उन टिप्पणियों का भी स्वागत किया जिनमें केंद्र सरकार को ब्रिटिश संग्रहालय में रखी मां सरस्वती की प्रतिमा को भारत वापस लाने की मांग पर विचार करने को कहा गया है।
उन्होंने कहा, ''यह प्रतिमा भारत की सांस्कृतिक आत्मा का प्रतीक है और इसे भोजशाला में इसके मूल स्थान पर पुनः स्थापित किया जाना चाहिए।''
भाषा राजकुमार नरेश
नरेश
1505 2002 दिल्ली