विकसित भारत की यात्रा की जड़ें नैतिकता, सामाजिक सद्भाव में ही समाहित होनी चाहिए: उपराज्यपाल संधू
नरेश
- 15 May 2026, 07:11 PM
- Updated: 07:11 PM
(फाइल फोटो के साथ)
नयी दिल्ली, 15 मई (भाषा) दिल्ली के उपराज्यपाल तरनजीत सिंह संधू ने शुक्रवार को कहा कि 2047 तक एक विकसित राष्ट्र बनने की भारत की यात्रा की जड़ें नैतिकता, सामाजिक सद्भाव और सामूहिक जिम्मेदारी में ही समाहित होनी चाहिए।
उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के हंसराज कॉलेज द्वारा आयोजित महात्मा हंसराज स्मृति व्याख्यान में विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए ये बात कही।
कॉलेज की निष्ठा सोसाइटी ने पुस्तकालय सभागार में यह व्याख्यान आयोजित किया था जिसका विषय 'भारतीय संस्कृति में सेवा और विकास की अवधारणा: विकसित भारत 2047' था । इस अवसर पर सिविल सेवा परीक्षा उत्तीर्ण करने वाले विद्यार्थियों और पूर्व विद्यार्थियों के लिए एक अभिनंदन समारोह भी शामिल था।
संधू ने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि हमेशा भारत की सभ्यतागत यात्रा ने विकास को केवल भौतिक या आर्थिक दृष्टि से नहीं देखा है, बल्कि एक ऐसे रूप में देखा है जिसकी जड़ें नैतिकता, कर्तव्य, सामाजिक जिम्मेदारी और सामूहिक कल्याण से गहराई से समाहित हों।
उन्होंने कहा, ''हमारी परंपरा में प्रगति को सेवा से कभी अलग नहीं किया गया है। 'सेवा' की अवधारणा ऐतिहासिक रूप से भारतीय समाज में नेतृत्व, शिक्षा और राष्ट्र निर्माण की समझ का केंद्र रही है।''
उपराज्यपाल ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने '2047 तक विकसित भारत' की जो परिकल्पना सामने रखी है वह केवल आर्थिक प्रगति से ही प्राप्त नहीं की जा सकती, बल्कि इसके लिए नैतिक विकास, सामाजिक सद्भाव, पर्यावरणीय संतुलन और सांस्कृतिक मजबूती भी आवश्यक है।
उन्होंने कहा,''सेवा विकास को मानवीय और नैतिक आधार प्रदान करती है, जबकि विकास समाज के सभी वर्गों के लिए गरिमा, अवसर और प्रगति सुनिश्चित करता है।''
अपने राजनयिक अनुभव का हवाला देते हुए उपराज्यपाल ने कहा कि विश्व स्तर पर भारत की ताकत उसकी सांस्कृतिक जड़ों, नैतिक मूल्यों और युवा शक्ति में निहित है।
उन्होंने कहा,''आज विश्व भारत को न केवल एक उभरती हुई आर्थिक शक्ति के रूप में देखता है, बल्कि सांस्कृतिक और नैतिक नेतृत्व के केंद्र के रूप में भी देखता है।''
संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) और राज्य परीक्षाओं में उत्तीर्ण हुए विद्यार्थियों को बधाई देते हुए संधू ने कहा कि लोक सेवा को एक जिम्मेदारी के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि विशेषाधिकार के रूप में।
उन्होंने विद्यार्थियों को व्यक्तिगत उपलब्धि से परे सफलता को देखने की सलाह भी दी और इस बात पर जोर दिया कि प्रत्येक पेशा समाज को आकार देने में योगदान देता है।
भाषा
राजकुमार नरेश
नरेश
1505 1911 दिल्ली