ड्रोन, यूएएस अब आसमान में 'बाज के पंजों' की तरह : वायुसेना प्रमुख सिंह
पवनेश
- 15 May 2026, 07:24 PM
- Updated: 07:24 PM
नयी दिल्ली, 15 मई (भाषा) भारतीय वायु सेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल ए पी सिंह ने शुक्रवार को कहा कि ड्रोन और अन्य मानवरहित हवाई प्रणालियों (यूएएस) से हवाई ताकत बढ़ी है और अब ये केवल आकाश में निगरानी करने वाले उपकरण ही नहीं हैं, बल्कि 'आसमान में बाज के पंजों' की तरह हैं।
वायुसेना अध्यक्ष ने मानवरहित हवाई प्रणालियों और यूएएस रोधी प्रणालियों पर एक रक्षा संगोष्ठी को संबोधित करते हुए रेखांकित किया कि किसी भी आधुनिक हवाई खतरे से निपटने के लिए उस क्षेत्र की पूरी जानकारी अति महत्वपूर्ण है, और एक ही हवाई क्षेत्र में काम करने वाली तीनों सेवाओं के बीच 'पूर्ण समन्वय' होना चाहिए।
वायु सेना प्रमुख ने पश्चिम एशिया संघर्ष के दौरान हुई हालिया घटना का जिक्र करते हुए कहा, ''हमने देखा है कि क्या होता है... अगर आपके पास उक्त क्षेत्र की जानकारी नहीं है, तो आपको पता नहीं होता कि आपके लोग कहां हैं और दूसरे कहां हैं। हमने देखा है कि कुवैत में एफ-15 विमानों के साथ क्या हुआ। आपसी संघर्ष। इसलिए हम ऐसी घटनाओं को सह नहीं कर सकते।''
अमेरिका की मध्य कमान ने दो मार्च को एक बयान में कहा था कि एक मार्च को कुवैत के ऊपर तीन अमेरिकी एफ-15ई स्ट्राइक ईगल विमान कथित तौर पर गलती से मित्र राष्ट्र की ओर से की गई गोलेबारी की वजह से दुर्घटनाग्रस्त हो गए।
यह संगोष्ठी थिंक-टैंक सेंटर फॉर एयरोस्पेस पावर एंड स्ट्रेटेजिक स्टडीज (सीएपीएसएस) और इंडियन मिलिट्री रिव्यू (आईएमआर) प्रकाशन द्वारा संयुक्त रूप से भारतीय वायु सेना के सुब्रतो पार्क में आयोजित की जा रही है।
वायु सेनाध्यक्ष ने कहा कि ड्रोन, मानवरहित हवाई प्रणालियां (यूएएस) और यूएएस रोधी प्रणालियां आज के समय में बेहद प्रासंगिक हैं। उन्होंने कहा कि यह एक वास्तविकता है, यह भविष्य की बात नहीं है।
उन्होंने कहा, ''इसलिए, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि युद्धक्षेत्र बदल गया है। हम पूरी तरह से केंद्रित हवाई शक्ति से हटकर एक प्रकार के विकेंद्रीकृत और स्वायत्त तरीके की ओर बढ़ रहे हैं।''
वायु सेना प्रमुख ने रेखांकित किया कि यूएएस ''वायु शक्ति का विस्तार'' है।
उन्होंने कहा, ''इसलिए, यूएएस प्रणालियों का उपयोग करते समय हवाई शक्ति के सभी नियम लागू होंगे, बस इसे याद रखें। और, वे अब आसमान में आंखें नहीं रहे, बल्कि आसमान में बाज के पंजों की तरह हैं। यह हमने हाल के संघर्षों में देखा है। हमने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी इसे महसूस किया था, और इस पहलू को भुलाया नहीं जा सकता।''
वायुसेना प्रमुख ने कहा, ''और, जब बात यूएएस रोधी प्रणाली की आती है, तो यह चूहे-बिल्ली के खेल जैसा है। आप एक क्षेत्र में तकनीक विकसित करते हैं, तो उसके साथ-साथ प्रतिरोधी तकनीक भी विकसित होनी चाहिए। क्योंकि खेल इसी तरह खेला जा सकता है, अन्यथा एक पक्ष को पूर्ण लाभ होगा।''उन्होंने कहा, ''हमेशा बल बनाम बल की लड़ाई नहीं हो सकती। यह बल बनाम रक्षा और अन्य का मुकाबला होना चाहिए।''
वायुसेना के शीर्ष अधिकारी ने पिछले वर्ष मई में भारत द्वारा की गई निर्णायक सैन्य कार्रवाई, ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय वायु सेना की अहम भूमिका को भी याद किया।
उन्होंने कहा, ''मुझे लगता है कि हमने ऑपरेशन सिंदूर में काफी अच्छा प्रदर्शन किया है। ऐसा इसलिए संभव हुआ क्योंकि इसमें समन्वय था। समन्वय के बिना, केंद्रीय एजेंसी के समन्वय के बिना, और एकीकृत वायु कमान और नियंत्रण प्रणाली (आईएसीसीएस) के एक तंत्रिका केंद्र के रूप में काम किए बिना, चाहे वह यूएएस रोधी कार्रवाई हो, हथियार या विमान रोधी कार्रवाई हो, यह संभव नहीं होता।''
एयर चीफ मार्शल ने कहा, ''हम सफल रहे... उनका कोई भी हथियार लक्ष्य पर नहीं गिरा। उनकी कोई भी यूएएस प्रणाली लक्ष्य को भेद नहीं सकी, क्योंकि हम उसी तरह से काम कर रहे थे जो सही तरीका है।''
उन्होंने कहा कि पाकिस्तान के साथ पिछले साल लगभग चार दिनों तक चले सैन्य संघर्ष के दौरान दुश्मन ने कई चरणों में ड्रोन हमले करने की कोशिश की, जिसका भारतीय सेना ने प्रभावी ढंग से मुकाबला किया।
सिंह ने एकीकृत हवाई रक्षा प्रणाली के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि ऐसी संरचनाएं स्थापित की गई हैं ताकि ''हर बार, हम उस तरीके से उनका मुकाबला करने में सक्षम हों''।
वायुसेना प्रमुख ने युद्धक्षेत्र में ड्रोन के इस्तेमाल से लागत विषमता को लेकर हो रही चर्चा पर भी अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि हमें यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि ''लागत उस हथियार प्रणाली की नहीं है जो हमला करने आ रही है, बल्कि उस प्रणाली की लागत है जिस पर वह हमला करने वाली है''।
उन्होंने कहा, ''कम लागत वाले हमले और उच्च लागत वाली रक्षा के बारे में बात हुई थी। इसका अभिप्राय है कि... हम सुनते आ रहे हैं कि कुछ सौ या कुछ हजार डॉलर के ड्रोन के लिए दस लाख डॉलर की मिसाइल का इस्तेमाल किया जा रहा है।''
सिंह ने कहा, ''अगर हमें अपनी यूएएस रोधी ताकत को बढ़ाना है, तो हमें इसे कम लागत वाला बनाना होगा क्योंकि अगर हमलावर प्रणालियों को उनकी कम लागत के कारण बढ़ाया जा सकता है और उनकी संख्या हजारों में हो सकती है, तो जाहिर है कि मुझे कुछ ऐसा चाहिए जो मैं वहन कर सकूं।''
उन्होंने कहा, ''लेकिन लागत उस हथियार प्रणाली की नहीं है जो हमला करने आ रही है। लागत उस प्रणाली की है जिस पर वह हमला करने वाली है। लक्ष्य क्या है? और कभी-कभी लक्ष्य ऐसा हो सकता है कि उस समय लागत के बारे में सोचने की कोई आवश्यकता ही न हो। इसलिए, हमें यह देखना होगा कि वह प्रणाली कितना नुकसान पहुंचा सकती है। और उसी के आधार पर... हम तय करते हैं कि उसे नष्ट करने के लिए क्या उपयोग करना है।''
चीफ एयर मार्शल ने कहा कि इसलिए, हमें इस पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है कि ''हमने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी कुछ महंगे विकल्पों का इस्तेमाल किया था।''
उन्होंने उपस्थित वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों, रक्षा और रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञों और सैन्य विद्वानों को संबोधित करते हुए रेखांकित किया, ''भविष्य मानवयुक्त और मानवरहित की टीम का है'', जिसमें दोनों विकल्पों का एक साथ उपयोग किया जाता है।
सिंह ने कहा, ''आप जवानों को प्रक्रिया से पूरी तरह अलग नहीं कर सकते। हो सकता है कि जवान प्रक्रिया में पूरी तरह शामिल न हो, या हो सकता है कि प्रक्रिया में उसका कुछ योगदान हो। लेकिन उसे प्रक्रिया से पूरी तरह बाहर नहीं किया जा सकता। मुझे नहीं लगता कि निकट भविष्य में, अगले दशक या उसके आसपास, हम उस स्थिति में होंगे।''
उन्होंने कहा कि यूएएस की युद्धक्षेत्र में टिके रहने की क्षमता अब भी एक चिंता का विषय है और युद्ध में हमारी प्रणाली को सक्रिय रखना एक ऐसी चीज है जिसके बारे में हमें सोचने की जरूरत है।
सिंह ने कहा, ''मैं सभी यूएएस की बात नहीं कर रहा, लेकिन उनमें से अधिकतर जो अच्छे हथियार ले जा सकते हैं या आईएसआर में अच्छी क्षमता प्रदान कर सकते हैं, वे बहुत असुरक्षित हैं। हमने इसे हाल के युद्धों में देखा है। अमेरिका ने इनमें से बड़ी संख्या में यूएएस खो दिए हैं। बेशक, आंकड़े अभी सामने नहीं आए हैं, लेकिन यह एक सच्चाई है।''
उन्होंने ''प्रासंगिकता की गति से नवाचार करने'' की आवश्यकता पर जोर दिया।
शीर्ष वायुसेना अधिकारी ने कहा, ''हम अपनी गति से नवाचार या अनुसंधान एवं विकास नहीं कर सकते। हमें गति बढ़ाने की आवश्यकता है क्योंकि प्रणाली के अप्रचलित होने से पहले उसे लागू करना होगा। इसलिए आज प्रणाली बनाते समय, हमें भविष्य की प्रणालियों के लिए अनुसंधान और विकास करना होगा।''
भाषा धीरज पवनेश
पवनेश
1505 1924 दिल्ली