अपने करियर को लेकर पत्नी की महत्वाकांक्षा क्रूरता या परित्याग नहीं: न्यायालय
माधव
- 12 May 2026, 10:00 PM
- Updated: 10:00 PM
नयी दिल्ली, 12 मई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में मंगलवार को कहा कि किसी योग्य महिला का अपने करियर को आगे बढ़ाने और अपने बच्चे के लिए सुरक्षित एवं स्थिर वातावरण सुनिश्चित करने का निर्णय ''क्रूरता'' या ''परित्याग'' नहीं माना जा सकता।
शीर्ष अदालत ने कहा कि एक कुटुंब अदालत द्वारा महिला के दंत चिकित्सक के रूप में अपने पेशेवर करियर को 'क्रूरता' और 'परित्याग' बताना एक 'सामंती' सोच, 'प्रतिगामी' और 'अति-रूढ़िवादी' दृष्टिकोण है।
गुजरात उच्च न्यायालय ने कुटुंब अदालत के आदेश को बरकरार रखा था, जिसे शीर्ष अदालत में चुनौती दी गयी थी।
न्यायमूर्ति विक्रमनाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने निचली अदालत और उच्च न्यायालय के इन 'प्रतिगामी' निष्कर्षों को खारिज कर दिया और कहा कि पत्नी की पेशेवर पहचान पर किसी भी प्रकार का 'अप्रत्यक्ष वैवाहिक वीटो' लागू नहीं किया जा सकता।
पीठ ने पति और पत्नी, दोनों की ओर से दायर परस्पर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कहा कि विवाह अब पूरी तरह टूट चुका है और इसे सुलह की संभावना न होने के कारण तलाक को आधार बनाकर समाप्त किया गया है, न कि पत्नी की ओर से क्रूरता या परित्याग के आधार पर।
शीर्ष अदालत ने इस बात का भी संज्ञान लिया कि पति ने दूसरी शादी कर ली है और पत्नी के खिलाफ झूठी गवाही का मामला चलाने की अर्जी खारिज कर दी।
हालांकि, शीर्ष अदालत ने कुटुंब अदालत द्वारा महिला के खिलाफ की गई टिप्पणियों को हटाते हुए कड़ी टिप्पणी की।
न्यायमूर्ति मेहता ने पीठ की ओर से लिखे फैसले में कहा, ''हम 21वीं सदी में हैं और इसके बावजूद एक योग्य महिला द्वारा अपने पेशेवर करियर को आगे बढ़ाने और बच्चे के पालन-पोषण के लिए सुरक्षित एवं स्थिर वातावरण सुनिश्चित करने के प्रयास को निचली अदालतों ने क्रूरता और परित्याग के रूप में देखा है।''
पीठ ने पारिवारिक न्यायालय की उन टिप्पणियों की आलोचना की, जिन्हें उच्च न्यायालय ने भी बरकरार रखा था। शीर्ष अदालत ने कहा कि ये टिप्पणियां ''न केवल कानूनी रूप से अस्थिर हैं, बल्कि अत्यंत चिंताजनक भी हैं''।
शीर्ष अदालत ने कहा, "यह विशेष रूप से रेखांकित किया जाना चाहिए कि एक शिक्षित और पेशेवर रूप से योग्य महिला से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह केवल वैवाहिक दायित्वों की कठोर सीमाओं में बंधी रहे। विवाह उसकी व्यक्तिगत पहचान को समाप्त नहीं करता, न ही उसके व्यक्तित्व को उसके पति की पहचान के अधीन कर देता है।''
पीठ ने आगे कहा कि पति और पत्नी दोनों का यह दायित्व है कि वे अपने वैवाहिक संबंधों में एक-दूसरे की आकांक्षाओं का सम्मान करते हुए संतुलन बनाए रखें, न कि कोई एक पक्ष दूसरे के जीवन-निर्णयों को एकतरफा रूप से नियंत्रित करे।
यह मामला एक वैवाहिक विवाद से उत्पन्न हुआ था, जो एक योग्य महिला दंत चिकित्सक और भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट कर्नल के पद पर तैनात उनके पति के बीच था।
वर्ष 2009 में विवाह के बाद पत्नी ने शुरू में पुणे में अपनी निजी प्रैक्टिस छोड़कर अपने पति के साथ कारगिल में उनकी तैनाती स्थल पर जाने का निर्णय लिया।
हालांकि, गर्भावस्था और उसके बाद बेटी को हुई चिकित्सीय जटिलताओं के कारण पत्नी बेहतर इलाज और बच्चे के स्थिर पालन-पोषण के लिए अहमदाबाद चली गईं। वहां उन्होंने एक दंत चिकित्सा क्लिनिक स्थापित किया।
बाद में कुटुंब अदालत ने ''क्रूरता'' और ''परित्याग'' के आधार पर पति की तलाक की अर्जी स्वीकार कर ली, जिसपर उच्च न्यायालय ने भी मुहर लगा दी। निचली अदालत का तर्क था कि पत्नी का यह "अनिवार्य कर्तव्य" है कि वह पति की तैनाती के स्थान पर उसके साथ रहे और उसने अपने वैवाहिक दायित्वों की तुलना में अपने करियर को प्राथमिकता दी।
भाषा सुरेश माधव
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