ममता के कड़े विरोध, चुनावों में बड़ी जीत की बदौलत मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे शुभेंदु
प्रशांत
- 08 May 2026, 07:56 PM
- Updated: 07:56 PM
(तस्वीरों के साथ)
कोलकाता, आठ मई (भाषा) केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने शुक्रवार को जब पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के प्रमुख चेहरों में एक शुभेंदु अधिकारी के आधिकारिक तौर पर पार्टी के विधायक दल का नेता चुने जाने की घोषणा की, तो राज्य में शायद ही किसी को आश्चर्य हुआ होगा।
इस कदम ने शीर्ष पद को लेकर जारी अटकलबाजी और सियासी ड्रामे के बीच शुभेंदु के लिए शनिवार को बंगाल के नौवें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने का मार्ग प्रशस्त कर दिया। वह राज्य में मुख्यमंत्री पद पर काबिज होने वाले भाजपा के पहले नेता भी होंगे।
शुभेंदु कई वजहों से मुख्यमंत्री पद के हकदार माने जाते हैं। उन्होंने तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो ममता बनर्जी को पांच साल के अंतराल में दो बड़े चुनावी झटके दिए। पहला, 2021 के विधानसभा चुनाव में उनका गढ़ कहलाने वाले नंदीग्राम में। दूसरा, 2026 के विधानसभा चुनावों में ममता का "अभेद्य" गढ़ माने जाने वाले भवानीपुर में।
शुभेंदु की चुनावी जीत और बंगाल में भाजपा की ऐतिहासिक सफलता सुनिश्चित करने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका ने उन्हें राज्य में पार्टी के उल्लेखनीय उभार के प्रमुख वास्तुकारों में से एक के रूप में मजबूती से स्थापित किया।
विपक्ष के नेता के रूप में विधानसभा परिसर के भीतर तीखी विधायी लड़ाइयों से लेकर उग्र प्रदर्शनों तक, शुभेंदु ने ममता सरकार की नीतियों और कानूनों के खिलाफ भाजपा के अभियान में खुद को अग्रिम मोर्चे पर रखा। वह सदन में आक्रामक भाषणों और जोरदार हस्तक्षेपों के साथ अक्सर कार्यवाही के केंद्र में रहे।
हालांकि, उस उथल-पुथल भरे दौर में उन्हें विपरीत परिणाम भी भुगतने पड़े। तत्कालीन तृणमूल नेतृत्व के साथ बार-बार टकराव के चलते शुभेंदु और कई भाजपा विधायकों को विधानसभा से कई बार निलंबित किया गया।
कुछ निलंबन तत्कालीन सत्र की पूरी अवधि तक बरकरार रहे, जबकि अन्य भी अपने आप में लगभग उतने ही कठोर थे। फरवरी 2025 में ऐसा ही एक उदाहरण देखने को मिला, जब शुभेंदु को 30 दिन के लिए विधानसभा की कार्यवाही में हिस्सा लेने से प्रतिबंधित कर दिया गया, जो राज्य के विधायी इतिहास में उस अवधि को परिभाषित करने वाले राजनीतिक टकरावों की असाधारण तीव्रता को रेखांकित करता है।
सदन के बाहर सड़क पर भी शुभेंदु पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ भाजपा के विरोध-प्रदर्शनों में सबसे आगे रहे।
साल 2021 के विधानसभा चुनावों के बाद कथित हिंसा के खिलाफ प्रदर्शनों की कमान संभालने से लेकर राज्य सचिवालय 'नबान्न' की ओर मार्च का नेतृत्व करने और भ्रष्टाचार, बेरोजगारी तथा कानून-व्यवस्था के मुद्दों पर कार्यकर्ताओं को लामबंद करने तक, शुभेंदु ने लगातार खुद को पार्टी के राजनीतिक अभियानों के केंद्र में रखा।
शुभेंदु ने स्कूल सेवा आयोग (एसएससी) से जुड़े भर्ती घोटाले के खिलाफ प्रदर्शनों के दौरान खास तौर पर आक्रामक भूमिका निभाई। उन्होंने व्यवस्थागत भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर बार-बार सरकार को निशाना बनाया और शीर्ष स्तर पर जवाबदेही की मांग की।
बंगाल में राजनीतिक टकराव गहराने के बीच शुभेंदु राज्य के कुछ सबसे अस्थिर क्षेत्रों में कार्यकर्ताओं को लामबंद करने वाले भाजपा के सबसे प्रमुख नेता के रूप में उभरे।
साल 2023 के पंचायत चुनावों के दौरान उन्होंने कथित चुनावी हिंसा और धमकी के खिलाफ प्रदर्शनों का लगातार नेतृत्व किया, जबकि 2024 में वह संदेशखलि में अशांति को लेकर पार्टी के आंदोलन के सबसे प्रमुख चेहरों में से एक रहे। उन्होंने सत्ताधारी प्रतिष्ठान पर स्थानीय दबंगों को संरक्षण देने और असहमति को दबाने का आरोप लगाया।
शुभेंदु ने आरजी कर मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में एक प्रशिक्षु महिला चिकित्सक के बलात्कार-हत्या की घटना को लेकर भाजपा के विरोध-प्रदर्शनों का भी नेतृत्व किया, जिसका उद्देश्य जनता के गुस्से को राज्य सरकार के खिलाफ एक व्यापक आंदोलन में तब्दील करना था।
शुभेंदु दिसंबर 2020 में तृणमूल छोड़ भाजपा में शामिल हो गए थे और वह तभी से बंगाल में पार्टी के लगभग हर बड़े आंदोलन में सबसे आगे रहे। रैलियों, धरनों, विधानसभा में टकराव और राज्यव्यापी अभियानों के जरिये उन्होंने एक जुझारू विपक्षी नेता के रूप में अपनी छवि को लगातार मजबूत किया।
शुभेंदु उन सभी पैमानों पर भी खरे उतरते हैं, जिन्हें शाह ने बंगाल में चुनाव प्रचार के दौरान मुख्यमंत्री पद के चेहरे में वांछित बताया था। उन्होंने कहा था कि बंगाल में भाजपा का मुख्यमंत्री पद का चेहरा वह व्यक्ति होगा, जो राज्य में जन्मा और पला-बढ़ा हो, जिसने बांग्ला माध्यम में शिक्षा हासिल की हो और जिसमें बांग्ला संस्कृति की झलक दिखती हो।
पंद्रह दिसंबर 1970 को पूर्व मेदिनीपुर जिले के कारकुली गांव में दिग्गज राजनीतिज्ञ शिशिर अधिकारी और गायत्री अधिकारी के घर जन्मे शुभेंदु ने शुरुआती पढ़ाई कोंटाई हाई स्कूल से की।
प्रभात कुमार कॉलेज से कला में स्नातक की डिग्री हासिल करने के बाद शुभेंदु ने कोलकाता के रवींद्र भारती विश्वविद्यालय से इतिहास में स्नातकोत्तर की पढ़ाई की, जहां राजनीति में उनकी दिलचस्पी जगी।
जीवन के प्रारंभिक वर्षों के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की शाखाओं में प्रशिक्षित शुभेंदु ने 1980 के दशक के अंत में कांग्रेस के छात्र संगठन 'छात्र परिषद' के सदस्य के रूप में राजनीति में कदम रखा।
उन्होंने 1995 में पहली बार चुनावी राजनीति में किस्मत आजमाई और कांथी नगरपालिका के पार्षद चुने गए, जिसका नेतृत्व उनके पिता शिशिर अधिकारी ने 1967 से 2009 तक किया था।
शुभेंदु 1999 में अपने पिता के साथ तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए। इसके बाद उन्होंने दो बार चुनाव लड़ा, लेकिन दोनों बार असफल रहे - 2001 के विधानसभा चुनाव और 2004 के लोकसभा चुनाव में। अंततः शुभेंदु को 2006 में सफलता मिली, जब उन्होंने कोंटाई विधानसभा सीट जीती।
साल 2007 में नंदीग्राम में हुए कृषि भूमि अधिग्रहण विरोधी आंदोलन ने बंगाल के राजनीतिक परिदृश्य को बदल दिया और शुभेंदु को तृणमूल की अग्रणी पंक्ति में ला खड़ा किया।
शुभेंदु जल्द ही तृणमूल के 'कोर ग्रुप' के सदस्य बन गए और उन्हें पार्टी की युवा कांग्रेस का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। 2009 और 2014 में उन्होंने तामलुक से लोकसभा चुनाव जीता।
ममता के 2011 में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बनने के बाद ज्यादातर लोगों ने शुभेंदु को उनके उत्तराधिकारी के रूप में देखा।
हालांकि, दोनों नेताओं के बीच अविश्वास उसी साल 21 जुलाई को तृणमूल की पहली वार्षिक शहीद दिवस रैली में पनपना शुरू हुआ, जब ममता ने अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी के राजनीति में प्रवेश की घोषणा की।
उस समय मात्र 24 साल के अभिषेक को तृणमूल कांग्रेस की युवा इकाई का अध्यक्ष बनाया गया, जो तृणमूल युवा कांग्रेस के समानांतर संगठन था। इस फैसले से शुभेंदु बेहद नाराज थे, क्योंकि पार्टी के संविधान में दो युवा संगठनों के लिए कोई जगह नहीं थी।
साल 2014 में शुभेंदु को तृणमूल युवा कांग्रेस के अध्यक्ष पद से हटा दिया गया और कुछ महीनों बाद इस संगठन का युवा कांग्रेस में विलय कर दिया गया।
इसके बाद, शुभेंदु ने ममता के नेतृत्व वाली राज्य सरकार में मई 2016 से नवंबर 2020 तक परिवहन मंत्री और 2018 से 2020 तक पर्यावरण मंत्री के रूप में काम किया।
हालांकि, 2020 के अंत में वह तृणमूल कांग्रेस से अलग हो गए।
शुभेंदु का सबसे बड़ा राजनीतिक दांव 2021 में नंदीग्राम विधानसभा क्षेत्र में ममता को चुनौती देना था, जहां उनकी जीत ने उन्हें पूरे राज्य में लोकप्रियता दिलाई।
उस जीत ने न केवल दशकों से इस क्षेत्र में राजनीतिक रूप से सक्रिय अधिकारी परिवार के प्रभुत्व को मजबूत किया, बल्कि उसके बड़े बेटे (शुभेंदु) को राज्य विधानसभा में विपक्ष के नेता के पद तक भी पहुंचा दिया।
भाजपा की विचारधाराओं के अनुरूप ढलने और भविष्य में पार्टी में अहम पद हासिल करने के लिए शुभेंदु ने भूमि अधिग्रहण आंदोलन के एक समावेशी नेता से अपनी छवि को हिंदुत्व ब्रिगेड के प्रतीक के रूप में बदलने का काम किया।
भाषा
पारुल प्रशांत
प्रशांत
0805 1956 कोलकाता