भारत पवित्र है, एकता की डोर से बंधा है: प्रधानमंत्री मोदी
रंजन
- 08 May 2026, 11:24 AM
- Updated: 11:24 AM
नयी दिल्ली, आठ मई (भाषा) प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शुक्रवार को कहा कि भारत का हर हिस्सा पवित्र है और वह एक ऐसी एकता की डोर से जुड़ा है जो भौगोलिक की सीमाओं से परे है तथा आज की विभाजित दुनिया में एकता की यह भावना पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक है।
मोदी ने पुनर्निर्मित सोमनाथ मंदिर को श्रद्धालुओं के लिए फिर से खोले जाने के 75 वर्ष पूरे होने के अवसर पर लिखे एक लेख में कहा कि गुजरात स्थित इस मंदिर की रक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर करने वालों तथा समय-समय पर इसका पुनर्निर्माण करने वालों के संघर्ष और बलिदान को कभी भुलाया नहीं जाएगा।
उन्होंने कहा कि विभाजनों से भरी दुनिया में एकता की यह भावना पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक है और सोमनाथ अपनी पूरी गरिमा के साथ हमेशा अडिग खड़ा रहेगा क्योंकि एकता और साझा सभ्यतागत चेतना की भावना हर भारतीय के हृदय में जीवित है।
उन्होंने कहा, ''सोमनाथ की रक्षा और इसके पुनर्निर्माण के लिए जिन्होंने अपना सर्वस्व बलिदान किया, उनका संघर्ष हम कभी नहीं भुला सकते। भारत के विभिन्न हिस्सों से आए लोगों ने इसकी भव्यता और दिव्यता को लौटाने में अपना अद्भुत योगदान दिया। उनकी ऐसी ही आस्था पूरे भारतवर्ष को लेकर भी थी। वे एकता की ऐसी अद्भुत डोर से बंधे थे, जिसे जमीनी सीमाओं में नहीं बांटा जा सकता।''
उन्होंने कहा, ''आज की विभाजित दुनिया में, सोमनाथ से मिलने वाली एकता की यह सीख पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक है। सोमनाथ अपनी गौरवशाली परंपरा के साथ हमेशा खड़ा रहेगा क्योंकि यह हमारी साझा सभ्यता का प्रतीक है। इसी गौरव को नमन करते हुए बलिदान देने वाले वीरों की स्मृति में और दानवीरों की उदारता को याद करते हुए अगले एक हजार दिनों तक यहां विशेष पूजा आयोजित की जाएगी। यह देखकर बहुत प्रसन्नता हो रही है कि बड़ी संख्या में लोग इस पुनीत कार्य में अपना योगदान दे रहे हैं।''
मोदी ने कहा, ''मैं सभी देशवासियों से आग्रह करता हूं कि इस पावन अवसर पर पवित्र सोमनाथ धाम की यात्रा करें और इसकी भव्यता के साक्षात दर्शन करें। जब आप सोमनाथ के तट पर खड़े होंगे, तब उसकी प्राचीन प्रतिध्वनियों को अपने भीतर महसूस करेंगे। वहां आपको केवल भक्ति का अनुभव नहीं होगा, बल्कि उस सभ्यतागत चेतना की सशक्त धड़कन भी सुनाई देगी, जो कभी रुकी नहीं जिसकी तीव्रता कभी कम नहीं हुई।''
उन्होंने कहा कि श्रद्धालु वहां भारत की उस अपराजित आत्मा का अनुभव करेंगे, जिसने हर आघात के बावजूद अपनी पहचान और अपनी संस्कृति को अक्षुण्ण बनाए रखा।
मोदी ने कहा, ''आप समझ पाएंगे कि इतने प्रयासों के बाद भी क्यों हमारी सभ्यता मिट नहीं सकी। वहां आपको चिर विजय के उस दर्शन का अनुभव होगा जो सदियों से भारत की शक्ति बना हुआ है। मुझे पूरा विश्वास है कि आपके लिए यह एक अविस्मरणीय अनुभव होगा।''
उन्होंने कहा कि 2026 की शुरुआत में उन्हें सोमनाथ स्वाभिमान पर्व में सम्मिलित होने का सौभाग्य मिला जो सोमनाथ मंदिर पर हुए पहले आक्रमण के एक हजार वर्ष बाद भी मंदिर के शाश्वत और अविनाशी होने का पर्व था।
मोदी ने कहा कि उन्हें पुनर्निर्मित सोमनाथ मंदिर के लोकार्पण की 75वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में अब 11 मई को एक बार फिर सोमनाथ जाने का सुअवसर प्राप्त होगा।
उन्होंने कहा कि छह महीनों के भीतर सोमनाथ के इतिहास से जुड़े इन दो अत्यंत महत्वपूर्ण पड़ावों का साक्षी बनना उनके लिए बहुत सौभाग्य की बात है।
मोदी ने कहा, ''सोमनाथ केवल एक मंदिर नहीं, हमारी सभ्यता का अटूट संकल्प है। इसके सामने लहराता विशाल समुद्र अनंत काल की अनूभूति कराता है। इसकी लहरें हमें सिखाती हैं कि तूफान चाहे कितने भी विकराल क्यों न हों, मनुष्य का साहस और आत्मबल हर बार फिर से उठ खड़ा होने में सक्षम है। तट से टकराती लहरें सदियों से यह उद्घोष कर रही हैं कि मानवीय चेतना को लंबे समय तक दबाया नहीं जा सकता है।''
उन्होंने कहा कि भारतीय प्राचीन शास्त्रों में लिखा है 'प्रभासं च परिक्रम्य पृथिवीक्रमसंभवम्' यानी अर्थात ''दिव्य सोमनाथ की परिक्रमा पूरी पृथ्वी की परिक्रमा के समान है।''
मोदी ने कहा कि जब लोग यहां दर्शन-पूजन के लिए आते हैं, तब उन्हें उस सभ्यता की अद्भुत निरंतरता का भी अनुभव होता है, जिसकी ज्योति कभी बुझाई नहीं जा सकी।
उन्होंने कहा, ''कई साम्राज्य आए और गए, समय बदला और इतिहास ने ढेरों उतार-चढ़ाव देखे, फिर भी सोमनाथ हमारे हृदय में हमेशा बना रहा। यह समय उन असंख्य महान विभूतियों के स्मरण का भी है, जो क्रूर आक्रांताओं के सम्मुख अडिग रहे।''
मोदी ने कहा कि लकुलीश और सोम शर्मा जैसे मनीषियों ने प्रभास को शैव दर्शन का महान केंद्र बनाया।
उन्होंने कहा कि चक्रवर्ती महाराज धारसेन चतुर्थ ने सदियों पहले वहां दूसरा मंदिर बनवाया था और समय की कठिन परीक्षा के बीच भीम प्रथम, जयपाल एवं आनंदपाल जैसे शासकों ने आक्रमणों के विरुद्ध अपनी सभ्यता की ढाल बनकर मंदिर की रक्षा की थी।
मोदी ने कहा कि ऐसा माना जाता है कि महान राजा भोज ने भी इस पावन स्थल के पुनर्निर्माण में अपना अमूल्य योगदान दिया था तथा कर्णदेव सोलंकी एवं जयसिंह सिद्धराज ने गुजरात की राजनीतिक और सांस्कृतिक शक्ति को पुनर्स्थापित करने में अहम भूमिका निभाई।
उन्होंने कहा कि भाव बृहस्पति, कुमारपाल सोलंकी और पाशुपताचार्यों ने इस तीर्थ को आराधना एवं ज्ञान के केंद्र के रूप में स्थापित करने में अमूल्य योगदान दिया तथा विशालदेव वाघेला और त्रिपुरांतक ने इसकी बौद्धिक और आध्यात्मिक परंपराओं की रक्षा की।
मोदी ने कहा, ''महिपाल चूड़ासमा और राव खंगार चूड़ासमा ने विध्वंस के बाद पूजा-पाठ की परंपरा को पुनर्जीवित किया। पुण्यश्लोक अहिल्याबाई होल्कर, जिनकी 300वीं जयंती मनाई जा रही है, उन्होंने सबसे चुनौतीपूर्ण समय में भी भक्ति की परंपरा को जीवंत रखा।''
प्रधानमंत्री ने कहा बड़ौदा के गायकवाड़ों ने तीर्थयात्रियों के अधिकारों की रक्षा की और देश की धरती वीर हमीरजी गोहिल एवं वीर वेगड़ाजी भील जैसे पराक्रमियों से धन्य हुई है जिनके साहस और बलिदान को आज भी याद किया जाता है।
उन्होंने कहा कि 1940 के दशक में जब स्वतंत्रता की भावना पूरे भारत में फैल रही थी और सरदार पटेल जैसे महान नेताओं के नेतृत्व में स्वतंत्र भारत की नींव रखी जा रही थी तब एक बात जो उन्हें बहुत व्यथित करती थी, वह थी- सोमनाथ की दुर्दशा।
मोदी ने कहा, ''13 नवंबर 1947 को, दिवाली के समय, उन्होंने सोमनाथ के जर्जर अवशेषों के सामने खड़े होकर, समुद्र का जल हाथ में लेकर संकल्प लिया, 'इस (गुजराती) नववर्ष पर हमारा निश्चय है कि सोमनाथ का पुनर्निर्माण होगा। सौराष्ट्र के लोगों को इसके लिए हर तरह से अपना योगदान देना होगा। यह एक पावन कार्य है, जिसमें हर किसी को भागीदारी निभानी होगी'।''
उन्होंने कहा कि सरदार पटेल के इस आह्वान ने सिर्फ गुजरात ही नहीं बल्कि संपूर्ण भारत को नए उत्साह से भर दिया।
मोदी ने कहा कि दुर्भाग्यवश, सरदार पटेल अपने उस सपने को साकार होते नहीं देख सके, जिसके लिए उन्होंने स्वयं को समर्पित कर दिया था और इससे पहले कि जीर्णोद्धार के बाद सोमनाथ मंदिर भक्तों के लिए खुलता, उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया।
उन्होंने कहा कि इसके बावजूद, प्रभास पाटन की पावन धरती पर उनका प्रभाव निरंतर महसूस किया जाता रहा है।
मोदी ने कहा, ''उनकी सोच को के.एम. मुंशी ने आगे बढ़ाया, जिन्हें नवानगर के जामसाहेब का समर्थन मिला। मंदिर का 1951 में पुनर्निर्माण पूरा होने पर राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद को उद्घाटन के लिए आमंत्रित किया गया। तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू के विरोध के बावजूद डॉ. प्रसाद ने समारोह में हिस्सा लेकर इसे ऐतिहासिक बना दिया।''
उन्होंने कहा कि उन्हें अक्टूबर 2001 का वह समय आज भी अच्छे से याद है, जब उन्होंने मुख्यमंत्री के रूप में दायित्व संभाला था और 31 अक्टूबर 2001 को सरदार पटेल की जयंती के अवसर पर गुजरात सरकार ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण की 50वीं वर्षगांठ का भव्य आयोजन किया था।
मोदी ने कहा कि इसी समय सरदार पटेल की 125वीं जयंती भी मनाई जा रही थी और इस कार्यक्रम में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और तत्कालीन गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी की मौजूदगी ने इसे और भी गरिमापूर्ण बना दिया।
उन्होंने कहा कि डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने 11 मई 1951 को अपने भाषण में कहा था कि सोमनाथ मंदिर दुनिया को यह संदेश देता है कि अद्वितीय श्रद्धा और विश्वास को कभी नष्ट नहीं किया जा सकता। प्रसाद ने आशा व्यक्त की थी कि यह मंदिर सदैव लोगों के हृदय में बसा रहेगा। मोदी ने कहा, ''उन्होंने (प्रसाद ने) यह भी कहा था कि मंदिर के पुनर्निर्माण से सरदार पटेल का सपना साकार हुआ है। उन्होंने इस बात पर भी बल दिया कि सरदार पटेल की भावनाओं के अनुरूप लोगों के जीवन में समृद्धि भी लानी होगी। इसे लेकर उनके संदेश अत्यंत प्रेरणादायी रहे हैं।''
उन्होंने कहा, ''पिछले एक दशक से हम इसी मार्ग पर चल रहे हैं। 'विकास भी, विरासत भी' के मंत्र से प्रेरित होकर सोमनाथ से काशी, कामाख्या से केदारनाथ, अयोध्या से उज्जैन और त्र्यम्बकेश्वर से श्रीशैलम तक, हमने अपने आध्यात्मिक केंद्रों को आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित किया है। इसके साथ ही उनकी पारंपरिक पहचान को भी बनाए रखा है।''
मोदी ने कहा कि आज बेहतर संपर्क सुविधा के कारण ज्यादा से ज्यादा लोग यहां आ पा रहे हैं और इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को बल मिल रहा है, आजीविका सुरक्षित हो रही है तथा 'एक भारत, श्रेष्ठ भारत' की भावना और सशक्त हो रही है।
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