आदिवासियों पर थाने की सफाई करने जैसी जमानत शर्तें लगाये जाने को लेकर न्यायालय ने नाराजगी जताई
माधव
- 04 May 2026, 10:07 PM
- Updated: 10:07 PM
नयी दिल्ली, चार मई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों पर पुलिस थानों की सफाई करने जैसी ''अपमानजनक'' शर्तें लगाये जाने को लेकर सोमवार को ओडिशा की अदालतों की कड़ी आलोचना की।
अदालत ने उड़ीसा उच्च न्यायालय द्वारा लगाई गई और सत्र अदालत द्वारा बरकरार रखी गई इस तरह की ''अपमानजनक'' जमानत शर्तों को ''अमान्य'' करार दिया।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने देश की सभी अदालतों से भविष्य में इस तरह की शर्तें लागू करने से परहेज करने का आग्रह किया।
पीठ ने कहा कि ये आदेश गहरी जड़ें जमा चुकी जाति-आधारित पूर्वाग्रह को दर्शाते हैं जो जातिविहीन समाज के संवैधानिक संकल्प को कमजोर करता है।
शीर्ष अदालत ने उड़ीसा उच्च न्यायालय और राज्य की जिला अदालतों द्वारा लगाये गए जमानत की शर्तों का स्वतः संज्ञान लिया था।
ये शर्तें उस मामले से संबंधित थीं, जिसमें आदिवासी और दलित समुदायों के सदस्यों को एक कॉरपोरेट कंपनी द्वारा भूमि अधिग्रहण किये जाने के विरोध में प्रदर्शन करने के बाद हिरासत में लिया गया था।
इन शर्तों के तहत, मुख्य रूप से दलित और आदिवासी समुदायों से संबंधित आरोपियों को कई महीनों तक पुलिस थानों की साफ-सफाई करनी पड़ती।
इन आदेशों पर ''निराशा और दुख'' व्यक्त करते हुए प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि देश की आजादी के 76 साल बाद, ऐसी शर्तें लगाई जा रही हैं।
उन्होंने कहा, ''दुर्भाग्यवश, ओडिशा में उच्च न्यायालय और कुछ जिला अदालतें जमानत देते समय ऐसी शर्तें लगा रहे हैं जो न्यायपालिका की छवि को धूमिल करती हैं।''
पीठ ने एक विशिष्ट मामले के तथ्यों पर गौर किया, जिसमें 40 व्यक्तियों को गिरफ्तार किया गया था और उनमें से कुछ को उड़ीसा उच्च न्यायालय से जमानत मिली थी। पीठ ने गौर किया कि दो महीने तक पुलिस थानों की सफाई करने जैसी अभूतपूर्व शर्तें लगाई गई थीं।
प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ''एक अन्य आदेश में, उच्च न्यायालय ने एक याचिकाकर्ता को जमानत देते हुए, इसी तरह का एक आदेश पारित किया था…... इससे न्यायपालिका का पूर्वाग्रह उजागर होता है क्योंकि आरोपी हाशिये पर मौजूद समुदाय से हैं।''
पीठ ने स्पष्ट किया कि अमीर प्रतिवादियों पर ऐसी शर्तें नहीं लगाई गईं।
शीर्ष अदालत ने राज्य की न्यायपालिका द्वारा प्रदर्शित प्रतिगामी मानसिकता पर अपनी ''गहरी निराशा'' व्यक्त की।
पीठ ने कहा, ''हम राज्य न्यायपालिका द्वारा लगाई गई ऐसी सभी शर्तों और इसी तरह की अन्य सभी शर्तों को अमान्य घोषित करते हैं। याचिकाकर्ता उच्च न्यायालय से तत्काल ऐसी शर्तों को हटाने का अनुरोध करें और उनके स्थान पर कोई अन्य समान शर्त न लगाएं।'' पीठ ने आदेश देते हुए स्पष्ट किया कि आरोपी जमानत पर ही रहेंगे।
पीठ ने शीर्ष अदालत की रजिस्ट्री को देश भर के सभी उच्च न्यायालयों को आदेश की प्रति भेजने का निर्देश भी दिया।
शीर्ष अदालत ने कहा, ''प्रत्येक उच्च न्यायालय यह सुनिश्चित करेगा कि इस आदेश की एक प्रति उसके अधिकार क्षेत्र में आने वाले प्रत्येक न्यायिक अधिकारी को भेजी जाए। साथ ही यह सूचना भी दी जाए कि जमानत देते समय ऐसी शर्तें नहीं लगाई जाएंगी।''
पीठ ने उड़ीसा उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार को चार सप्ताह के भीतर आदेश का पालन करने को कहा।
भाषा सुभाष माधव
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