बढ़ते तेजाब हमले चिंता का विषय; सजा बढ़ाने पर विचार करे केंद्र: न्यायालय
नरेश
- 04 May 2026, 07:16 PM
- Updated: 07:16 PM
नयी दिल्ली, चार मई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने 'बर्बर' तेजाब हमलों के मामलों में चिंताजनक वृद्धि को देखते हुए सोमवार को केंद्र से ऐसे अपराधों के लिए सजा बढ़ाने पर विचार करने और बेगुनाही साबित करने का भार आरोपी पर डालने का सुझाव दिया।
आपराधिक न्यायशास्त्र के तहत, जब तक कानून में अन्य प्रावधान नहीं हों, आरोपी के खिलाफ दोष साबित करने का भार अभियोजन पक्ष पर होता है।
न्यायालय ने निर्देश दिया कि उपयुक्त संशोधन होने तक, जिन लोगों को जबरन तेजाब पिलाया गया हो या जिन्हें बाहरी विकृति के बिना आंतरिक चोटें आई हों, वे दिव्यांग व्यक्तियों का अधिकार अधिनियम, 2016 के तहत तेजाब हमलों के पीड़ितों के दायरे में आएंगे।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि यह स्पष्टीकरण 2016 के अधिनियम के लागू होने के समय से ही शामिल माना जाएगा।
पीठ ने कहा, ''यदि संबंधित मंत्रालय औपचारिक रूप से इस संशोधन को अधिसूचित करता है तो इसका स्वागत किया जाएगा।''
न्यायालय ने यह आदेश तेजाब हमले की पीड़िता शाहीन मलिक द्वारा दायर जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए पारित किया। शाहीन ने अनुरोध किया था कि ऐसे पीड़ितों को दिव्यांग व्यक्तियों की श्रेणी में रखा जाए ताकि उन्हें कल्याणकारी योजनाओं का लाभ मिल सके।
प्रधान न्यायाधीश ने सोमवार को सुनवाई के दौरान टिप्पणी की कि तेजाब हमलों के लिए निर्धारित सजा प्रभावी साबित नहीं हो रही है।
उन्होंने कहा, "मामलों की संख्या बढ़ गई है। बर्बर और क्रूर तेजाब हमले हुए हैं। क्या आपको नहीं लगता कि सजा और भी कड़ी होनी चाहिए?"
पीठ ने कहा कि 2013 से तेजाब हमलों के मामलों में "चिंताजनक वृद्धि" हुई है, जो गंभीर विचारणीय विषय है।
उसने सुझाव दिया कि सरकार को ऐसे अपराधों के लिए सजा में पर्याप्त रूप से वृद्धि पर विचार करना चाहिए, साथ ही आरोपी पर यह साबित करने का भार भी डालना चाहिए कि वह दोषी नहीं है।
पीठ ने यह भी सुझाव दिया कि ऐसे जघन्य मामलों में दोषी पाए गए लोगों की संपत्ति जब्त करके पीड़ितों को मुआवजा दिया जाए।
पीठ ने बाजार में तेजाब की बिक्री पर नियंत्रण की आवश्यकता पर भी जोर दिया।
प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि ऐसे अपराधों से अत्यंत सख्ती से निपटा जाना चाहिए।
सुनवाई के दौरान, पीठ के समक्ष जिक्र किया गया कि जिन पीड़ितों को जबरदस्ती तेजाब पिलाया गया था, उन्हें 2016 के अधिनियम के तहत 'तेजाब हमले के पीड़ितों' की परिभाषा में शामिल नहीं किया गया है।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ को सूचित किया कि नोडल मंत्रालय ने 2016 के कानून से जुड़ी अनुसूची में संशोधन का प्रस्ताव पहले ही दे दिया है।
मामले में अगली सुनवाई दो सप्ताह बाद होगी।
भाषा अविनाश नरेश
नरेश
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