पर्यवेक्षण को औपचारिक अनुपालन से देखना चाहिए आगे: आरबीआई डिप्टी गवर्नर
प्रेम
- 04 May 2026, 06:36 PM
- Updated: 06:36 PM
नयी दिल्ली, चार मई (भाषा) भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के डिप्टी गवर्नर स्वामीनाथन जे. ने कहा कि हल्के नियमन वाली प्रणाली कुछ समय तक कम लागत और तेज वृद्धि के कारण असरदार दिख सकती है लेकिन वृद्धि के कमजोर कॉरपोरेट गवर्नेंस, खराब ऋण मानकों या छिपे जोखिमों पर आधारित होने पर इसकी कीमत जमाकर्ताओं और व्यापक अर्थव्यवस्था दोनों को चुकानी पड़ती है।
इसके साथ ही उन्होंने पर्यवेक्षण के महत्व पर बल देते हुए कहा कि संस्थानों एवं कंपनियों को केवल दिए गए आंकड़ों के आधार पर नहीं समझा जा सकता है।
उन्होंने हाल में दिए एक व्याख्यान में कहा, ''पर्यवेक्षण को औपचारिक अनुपालन से आगे देखना चाहिए। अनुपालन यह पूछता है कि नियम का पालन हुआ या नहीं। वहीं, पर्यवेक्षण यह पूछता है कि क्या अंतर्निहित जोखिम को समझा और संबोधित किया गया है।''
स्वामीनाथन ने इस बात पर जोर दिया कि संस्थानों और कंपनियों को केवल रिपोर्ट किए गए आंकड़ों से नहीं समझा जा सकता है। उन्होंने कहा कि आंकड़ों के पीछे के कारणों को भी समझने की जरूरत है।
उन्होंने कहा, '' ऑडिट किए गए बही-खाते और सूचना उपयोगी हैं, लेकिन वे खुद व्यवसाय नहीं होते। असली कारोबार कारखाना, उत्पादन स्थल, बाजार, आपूर्ति शृंखला, प्रबंधन की गुणवत्ता और लिए गए निर्णयों में दिखता है। इसलिए बैंकर का काम संदेहपूर्ण होने का नहीं, बल्कि जिज्ञासु होने का है।"
स्वामीनाथन ने 30 अप्रैल को चेन्नई स्थित मद्रास स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में 'लर्निंग, जजमेंट एंड पब्लिक पर्पज—लेसन्स फ्रॉम बैंकिंग' विषय पर 12वां जी रामचंद्रन स्मृति व्याख्यान दिया था। यह व्याख्यान सोमवार को आरबीआई की वेबसाइट पर अपलोड किया गया।
डिप्टी गवर्नर ने कहा, ''हल्के पर्यवेक्षण वाली प्रणाली कुछ समय तक कुशल दिख सकती है, क्योंकि लागत कम होती है और वृद्धि तेज हो सकती है। हालांकि यदि यह वृद्धि कमजोर कॉरपोरेट शासन, खराब ऋण मानकों या छिपे जोखिमों पर आधारित है, तो आखिरकार इसकी कीमत न केवल शेयरधारकों या प्रबंधन बल्कि जमाकर्ताओं, उधारकर्ताओं, करदाताओं और व्यापक अर्थव्यवस्था को चुकानी पड़ती है।''
उन्होंने कहा, ''पर्यवेक्षण का वास्तविक मूल्य ऐसे परिणामों की संभावना और गंभीरता को कम करने में है।''
छात्रों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि बैंकिंग अधिक डिजिटल, अधिक डेटा-आधारित और अधिक परस्पर संबद्ध होता जा रहा है।
उन्होंने कहा कि अब ऋण मंच के माध्यम से उत्पन्न किए जा सकते हैं, भुगतान तुरंत होते हैं, 'एल्गोरिदम' ऋण देने के निर्णयों को प्रभावित कर सकते हैं और गैर-बैंक संस्थाएं वित्तीय मध्यस्थता में बढ़ती भूमिका निभा रही हैं।
स्वामीनाथन ने कहा कि ये बदलाव अपार संभावनाएं लेकर आते हैं क्योंकि ये पहुंच बढ़ा सकते हैं, लागत कम कर सकते हैं और दक्षता में सुधार कर सकते हैं, लेकिन इसके साथ नए सवाल भी खड़े होते हैं।
भाषा निहारिका प्रेम
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